गृहिणियों के काम की क्या है असली कीमत? सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद GDP में शामिल करने पर छिड़ी बहस
सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों के घरेलू श्रम को आर्थिक मूल्य देने की बात कही है। जानिए GDP में गृहिणियों के योगदान को शामिल करने पर क्यों तेज हुई बहस और इसके क्या हो सकते हैं प्रभाव।

भोपाल। सुबह की पहली चाय से लेकर रात के आखिरी काम तक करोड़ों भारतीय गृहिणियां परिवार और समाज की रीढ़ बनी रहती हैं। खाना बनाना, बच्चों की परवरिश, बुजुर्गों की देखभाल, घर का बजट संभालना और भावनात्मक सहयोग देना—ये सभी जिम्मेदारियां बिना वेतन और बिना औपचारिक मान्यता के निभाई जाती हैं। अब सुप्रीम कोर्ट की एक महत्वपूर्ण टिप्पणी ने इस लंबे समय से चल रही बहस को फिर से केंद्र में ला दिया है कि क्या गृहिणियों के अवैतनिक श्रम को आर्थिक मूल्य देकर देश की जीडीपी में शामिल किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने गृहिणियों को बताया ‘राष्ट्र निर्माता’
11 जून को सुनाए गए एक अहम फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मोटर दुर्घटना में किसी गृहिणी की मृत्यु होने पर मुआवजा तय करते समय उसके घरेलू श्रम का स्वतंत्र आर्थिक मूल्य माना जाना चाहिए। न्यायमूर्ति Sanjay Karol और N. Kotiswar Singh की पीठ ने गृहिणियों को “राष्ट्र निर्माता” बताते हुए प्रति माह 30 हजार रुपये की न्यूनतम काल्पनिक आय निर्धारित की और “घरेलू देखभाल की हानि” को मुआवजे का अलग आधार माना।
क्या था मामला?
यह फैसला पंजाब की एक सड़क दुर्घटना से जुड़े मामले में आया। वर्ष 2001 में रेशमा नामक महिला की मृत्यु के बाद उनके परिवार ने मुआवजे की मांग की थी। लंबी कानूनी प्रक्रिया के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां न्यायालय ने गृहिणियों के घरेलू श्रम के आर्थिक महत्व को रेखांकित करते हुए बड़ा निर्णय दिया।
GDP में क्यों नहीं गिना जाता घरेलू श्रम?
सकल घरेलू उत्पाद (GDP) केवल उन गतिविधियों को मापता है जिनमें प्रत्यक्ष आर्थिक लेन-देन होता है। इसलिए घर में तैयार किया गया भोजन, बच्चों की देखभाल या बुजुर्गों की सेवा जैसे कार्य आर्थिक आंकड़ों में शामिल नहीं होते।
लेकिन यही सेवाएं यदि किसी होटल, डे-केयर सेंटर या केयर होम द्वारा प्रदान की जाएं तो उनका मूल्य GDP में जुड़ जाता है। यही कारण है कि करोड़ों महिलाओं का योगदान आर्थिक आंकड़ों में दिखाई नहीं देता।
अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी ‘अदृश्य सब्सिडी’
विशेषज्ञों का मानना है कि भारतीय अर्थव्यवस्था का एक बड़ा हिस्सा महिलाओं के अवैतनिक श्रम पर टिका हुआ है। कई अध्ययनों और रिपोर्टों में अनुमान लगाया गया है कि गृहिणियों के काम का आर्थिक मूल्य देश की GDP का 7% से लेकर 17% तक हो सकता है।
यदि घरों में किए जाने वाले सभी कार्यों के लिए अलग-अलग कर्मचारी नियुक्त किए जाएं, तो परिवारों का मासिक खर्च हजारों रुपये बढ़ सकता है। ऐसे में घरेलू श्रम को देश की सबसे बड़ी ‘अनदेखी आर्थिक सब्सिडी’ माना जा रहा है।
महिलाएं कर रही हैं समय का सबसे बड़ा निवेश
भारत सरकार के टाइम यूज सर्वे के अनुसार भारतीय महिलाएं प्रतिदिन औसतन सात घंटे घरेलू और देखभाल संबंधी कार्यों में लगाती हैं, जबकि पुरुषों का औसत समय लगभग एक घंटा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यही अतिरिक्त जिम्मेदारियां महिलाओं की शिक्षा, रोजगार और आर्थिक अवसरों को सीमित करती हैं, जिससे उनकी श्रम भागीदारी दर भी प्रभावित होती है।
गृहिणियों का योगदान केवल रसोई तक सीमित नहीं
घरेलू श्रम कई महत्वपूर्ण जिम्मेदारियों का समावेश है—
- भोजन और पोषण: परिवार के सदस्यों के लिए पौष्टिक भोजन की व्यवस्था और स्वास्थ्य का ध्यान रखना।
- बच्चों और बुजुर्गों की देखभाल: शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा और भावनात्मक सहयोग सुनिश्चित करना।
- घर का संचालन: सफाई, बजट प्रबंधन, खरीदारी, समय प्रबंधन और दैनिक आवश्यकताओं का समन्वय करना।
दुनिया के कई देशों में मिल रही मान्यता
दुनिया के कई देशों ने घरेलू श्रम की महत्ता को स्वीकार किया है। स्वीडन में परिवार और बच्चों की देखभाल में लगाए गए समय के आधार पर महिलाओं को पेंशन क्रेडिट दिए जाते हैं। वहीं कनाडा घरेलू कार्यों में खर्च होने वाले समय का नियमित आकलन कर नीति निर्माण में उसका उपयोग करता है।
क्या गृहिणियों को वेतन मिलना चाहिए?
इस मुद्दे पर मतभेद हैं। कुछ विशेषज्ञ गृहिणियों को प्रत्यक्ष वेतन देने के बजाय सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, बीमा और आर्थिक पहचान जैसे उपायों की वकालत करते हैं। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि घरेलू जिम्मेदारियों को पारिवारिक व्यवस्था का हिस्सा माना जाना चाहिए।
हालांकि अधिकांश अर्थशास्त्री इस बात पर सहमत हैं कि घरेलू श्रम की आर्थिक उपयोगिता को नकारा नहीं जा सकता और उसे किसी न किसी रूप में मान्यता मिलनी चाहिए।
आगे क्या बदल सकता है?
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक मुआवजा विवाद तक सीमित नहीं माना जा रहा। विशेषज्ञों के अनुसार यह निर्णय भविष्य में महिलाओं के लिए सामाजिक सुरक्षा, पेंशन, बीमा और घरेलू श्रम के आर्थिक मूल्यांकन से जुड़ी नीतियों को प्रभावित कर सकता है।
साथ ही, यह बहस भी तेज हो सकती है कि भारत की आर्थिक प्रगति के आकलन में उन करोड़ों महिलाओं के योगदान को कैसे शामिल किया जाए, जिनका श्रम आज भी राष्ट्रीय आय के आंकड़ों में दिखाई नहीं देता, लेकिन जिनके बिना परिवार और समाज की व्यवस्था चल पाना संभव नहीं है।




