ग्लोबल वॉर्मिंग के बीच अटलांटिक में बढ़ रही रहस्यमयी ठंडक, ‘कोल्ड ब्लॉब’ ने बढ़ाई वैज्ञानिकों की चिंता
अटलांटिक महासागर में ग्रीनलैंड के दक्षिण स्थित रहस्यमयी ‘कोल्ड ब्लॉब’ वैज्ञानिकों की चिंता बढ़ा रहा है। जानिए AMOC क्या है, यह क्यों कमजोर हो रहा है और इसका भारत के मॉनसून पर क्या असर पड़ सकता है।

नई दिल्ली. एक तरफ पूरी दुनिया ग्लोबल वॉर्मिंग की मार झेल रही है और समुद्रों का तापमान लगातार नए रिकॉर्ड बना रहा है, वहीं अटलांटिक महासागर में ग्रीनलैंड के दक्षिण का एक हिस्सा वैज्ञानिकों के लिए पहेली बना हुआ है। यह क्षेत्र लगातार ठंडा हो रहा है और इसे वैज्ञानिक ‘कोल्ड ब्लॉब’ या ‘नॉर्थ अटलांटिक वार्मिंग होल’ के नाम से जानते हैं।
जलवायु वैज्ञानिकों के अनुसार, जब दुनिया के अधिकांश हिस्सों में तापमान बढ़ रहा है, तब इस क्षेत्र में लगातार दर्ज हो रही ठंडक पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में बड़े बदलाव का संकेत हो सकती है।
क्या है ‘कोल्ड ब्लॉब’?
अटलांटिक महासागर में ग्रीनलैंड के दक्षिण स्थित यह क्षेत्र वैश्विक तापमान वृद्धि के विपरीत व्यवहार करता है। उपग्रह और समुद्री अध्ययनों से पता चला है कि पिछले कई दशकों में यहां समुद्र की सतह का तापमान अपेक्षाकृत कम हुआ है, जबकि दुनिया के अधिकांश महासागरीय क्षेत्र गर्म हुए हैं।
वैज्ञानिकों का मानना है कि यह असामान्य ठंडक केवल स्थानीय घटना नहीं, बल्कि वैश्विक महासागरीय धाराओं में आ रहे बदलावों का संकेत हो सकती है।
क्या है AMOC, जिसे कहा जाता है समुद्र का ‘ग्लोबल कन्वेयर बेल्ट’?
इस रहस्य के केंद्र में है Atlantic Meridional Overturning Circulation (AMOC)। यह महासागरीय धाराओं का एक विशाल नेटवर्क है जो भूमध्य रेखा से गर्म पानी को उत्तर अटलांटिक की ओर ले जाता है और वहां ठंडा व अधिक खारा पानी गहराई में जाकर दक्षिण दिशा की ओर लौटता है।
AMOC दुनिया की जलवायु को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यूरोप के अपेक्षाकृत गर्म मौसम, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और वैश्विक तापमान संतुलन में इसकी अहम भूमिका मानी जाती है।
क्यों कमजोर पड़ रहा है यह महासागरीय तंत्र?
विशेषज्ञों के अनुसार, ग्लोबल वॉर्मिंग के कारण Greenland Ice Sheet की बर्फ तेजी से पिघल रही है। इससे बड़ी मात्रा में मीठा पानी समुद्र में मिल रहा है।
यह मीठा पानी समुद्र के खारे पानी की घनत्व संरचना को बदल देता है, जिससे ठंडा और भारी पानी नीचे नहीं बैठ पाता। परिणामस्वरूप AMOC की गति धीमी होने लगती है। जब यह प्रणाली कमजोर होती है तो उत्तर अटलांटिक तक गर्म पानी कम पहुंचता है और ग्रीनलैंड के दक्षिण का क्षेत्र अपेक्षाकृत ठंडा बना रहता है।
कार्बन अवशोषण क्षमता पर भी पड़ सकता है असर
AMOC केवल तापमान नियंत्रित नहीं करता, बल्कि महासागरों की कार्बन डाइऑक्साइड अवशोषित करने की क्षमता से भी जुड़ा है। यदि यह प्रणाली और कमजोर होती है तो समुद्र कम कार्बन सोख पाएंगे, जिससे वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा बढ़ सकती है। इसका असर जलवायु परिवर्तन की गति को और तेज करने के रूप में सामने आ सकता है।
भारत के मॉनसून पर क्यों है खतरा?
जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि AMOC में बड़े बदलाव का असर केवल अटलांटिक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। इसका प्रभाव वैश्विक मौसम प्रणालियों, समुद्री तापमान और वर्षा चक्र पर भी पड़ सकता है।
विशेषज्ञों के अनुसार, यदि यह महासागरीय तंत्र गंभीर रूप से कमजोर हुआ या भविष्य में ठप पड़ गया, तो दक्षिण एशिया के मॉनसून पैटर्न में बड़े बदलाव आ सकते हैं। इससे भारत में बारिश के वितरण, कृषि उत्पादन और जल संसाधनों पर असर पड़ने की आशंका बढ़ सकती है।
यूरोप में बढ़ सकती है भीषण ठंड
AMOC के कमजोर होने का सबसे प्रत्यक्ष प्रभाव यूरोप पर पड़ सकता है। वैज्ञानिकों के कई अध्ययनों में संकेत मिले हैं कि उत्तर-पश्चिमी यूरोप के कुछ हिस्सों में तापमान में उल्लेखनीय गिरावट आ सकती है, जिससे सर्दियां अधिक कठोर हो सकती हैं।
हालांकि विशेषज्ञ यह भी स्पष्ट करते हैं कि AMOC के भविष्य को लेकर अभी शोध जारी है और इसके पूरी तरह बंद होने की संभावना, समयसीमा तथा प्रभावों को लेकर वैज्ञानिक समुदाय में विभिन्न मत मौजूद हैं।
क्यों महत्वपूर्ण है यह चेतावनी?
‘कोल्ड ब्लॉब’ केवल महासागर में मौजूद एक ठंडा क्षेत्र नहीं है, बल्कि यह पृथ्वी की जलवायु प्रणाली में हो रहे गहरे परिवर्तनों का संकेत माना जा रहा है। वैज्ञानिक लगातार इसकी निगरानी कर रहे हैं क्योंकि इससे भविष्य में मौसम, समुद्री पारिस्थितिकी, खाद्य सुरक्षा और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर व्यापक प्रभाव पड़ सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में कमी और जलवायु परिवर्तन पर प्रभावी नियंत्रण ही ऐसे संभावित खतरों को कम करने का सबसे बड़ा उपाय है।




