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‘पंचायत’ के प्रधान जी का संघर्ष: घर छोड़कर पहुंचे थिएटर, 20 साल तक गांव नहीं लौटे रघुबीर यादव

'पंचायत' फेम रघुबीर यादव ने अपने संघर्षभरे दिनों को याद करते हुए बताया कि वह कभी ढाई रुपये रोज कमाते थे और कई बार भूखे सोने को मजबूर हुए। जानिए थिएटर से फिल्मों तक का उनका प्रेरणादायक सफर।

मुंबई. वेब सीरीज Panchayat में ‘प्रधान जी’ के किरदार से घर-घर में लोकप्रिय हुए Raghubir Yadav ने अपने संघर्षभरे दिनों को याद करते हुए कई भावुक खुलासे किए हैं। आज अपनी शानदार अदाकारी के लिए पहचाने जाने वाले रघुबीर यादव ने बताया कि एक समय ऐसा भी था जब वह महज ढाई रुपये रोज कमाकर गुजारा करते थे और कई बार भूखे पेट सोने की नौबत आ जाती थी।

“मैंने कभी इसे संघर्ष नहीं माना”

हाल ही में दिए एक इंटरव्यू में रघुबीर यादव ने कहा कि अभिनय की दुनिया में आगे बढ़ना आसान नहीं था, लेकिन उन्होंने अपने जीवन को कभी संघर्ष के रूप में नहीं देखा।

उन्होंने कहा कि लोग अक्सर ‘संघर्ष’ शब्द को बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं, जबकि किसी भी कला में लगातार अभ्यास और सीखने की जरूरत होती है। “मैंने कड़ी मेहनत की और पूरे सफर का आनंद लिया। आज भी मुझे लगता है कि बहुत कुछ सीखना बाकी है।”

बोर्ड परीक्षा से पहले छोड़ दिया था घर

रघुबीर यादव ने बताया कि परिवार की इच्छा थी कि वह साइंस की पढ़ाई करें और एक सुरक्षित करियर चुनें, लेकिन उन्हें पहले से एहसास था कि वह बोर्ड परीक्षा में सफल नहीं हो पाएंगे। इसी डर और असमंजस के बीच उन्होंने एक दोस्त के साथ घर छोड़ दिया और Lalitpur पहुंच गए। यहीं उनकी जिंदगी ने नया मोड़ लिया।

थिएटर से शुरू हुआ अभिनय का सफर

ललितपुर में उनकी मुलाकात अभिनेता Annu Kapoor के पिता की थिएटर कंपनी से हुई। कंपनी संचालक मदनलाल कपूर ने उन्हें थिएटर में काम करने का मौका दिया। रघुबीर यादव ने बताया कि उन्हें प्रतिदिन सिर्फ ढाई रुपये मिलते थे और कई बार पूरी मजदूरी भी नहीं मिल पाती थी।

रोटी-टमाटर की चटनी से चलता था गुजारा

अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए अभिनेता ने बताया कि कम पैसों में वे आटा और टमाटर खरीदकर रोटी-चटनी बनाते थे। कई बार हालात इतने खराब हो जाते थे कि खाने का सामान भी चोरी हो जाता था और उन्हें भूखे रहना पड़ता था। इसके बावजूद उन्होंने थिएटर और कला के प्रति अपना जुनून नहीं छोड़ा।

उर्दू सीखी, अभिनय को बनाया जीवन

थिएटर के दिनों में रघुबीर यादव ने उर्दू भाषा सीखी, अपनी उच्चारण शैली में सुधार किया और संगीत व अभिनय की बारीकियों को समझा। उनका कहना है कि वही दौर उनके व्यक्तित्व और अभिनय की असली नींव बना।

एक ताने ने बदल दी जिंदगी

रघुबीर यादव ने बताया कि घर छोड़ने के बाद उन्होंने अपने पिता को पत्र लिखकर भरोसा दिलाया था कि वह कभी परिवार का नाम खराब नहीं करेंगे। करीब छह महीने बाद वह घर लौटे, लेकिन एक रिश्तेदार के ताने ने उन्हें अंदर तक झकझोर दिया। रिश्तेदार ने कहा था, “हमें लगा था अब तुम सीधे सिनेमा के पर्दे पर ही दिखाई दोगे।” यह बात उन्हें इतनी चुभी कि उसी रात उन्होंने फिर घर छोड़ दिया।

20 साल तक गांव नहीं लौटे

रघुबीर यादव ने खुलासा किया कि उस घटना के बाद उन्होंने अपने गांव से दूरी बना ली और करीब 20 वर्षों तक वापस नहीं लौटे। आज थिएटर से लेकर फिल्मों और वेब सीरीज तक अपनी दमदार अभिनय क्षमता का लोहा मनवा चुके रघुबीर यादव की कहानी इस बात का उदाहरण है कि लगन, धैर्य और लगातार सीखने की इच्छा किसी भी व्यक्ति को सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचा सकती है।

Republic News Desk

इस समाचार पोर्टल के लेखक एवं संपादक हैं। दस वर्षों की पत्रकारिता अनुभव से सत्य और संतुलित खबरें पेश करने का जुनून रखते हैं। अपनी टीम के साथ राजनीति, टेक्नोलॉजी, क्राइम और संस्कृति की गहरी कवरेज देते हैं। पाठकों का विश्वास ही इनका मिशन है।

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