CM के बयान के 48 घंटे बाद तीसरी संतान वाले अफसर की बर्खास्तगी, MP में नियम बनाम घोषणा पर उठे सवाल
मध्यप्रदेश में मुख्यमंत्री मोहन यादव की घोषणा के बावजूद सिंगरौली के सब-रजिस्ट्रार अशोक सिंह परिहार को तीसरी संतान के आधार पर बर्खास्त कर दिया गया। जानिए पूरा मामला और उठ रहे सवाल।

भोपाल. मध्यप्रदेश में सरकारी सेवा से जुड़े एक फैसले ने राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में नई बहस छेड़ दी है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव द्वारा दो से अधिक संतान के आधार पर नौकरी न जाने की बात कहे जाने के महज 48 घंटे बाद सिंगरौली के सब-रजिस्ट्रार अशोक सिंह परिहार को तीसरी संतान के मामले में सेवा से बर्खास्त कर दिया गया। इस कार्रवाई ने सरकारी नियमों और राजनीतिक घोषणाओं के बीच तालमेल को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
क्या है पूरा मामला?
सिंगरौली में पदस्थ सब-रजिस्ट्रार अशोक सिंह परिहार के खिलाफ शिकायत की गई थी कि शासकीय सेवा में रहते हुए उनकी तीसरी संतान का जन्म हुआ। शिकायत मिलने के बाद विभाग ने पहले कारण बताओ नोटिस जारी किया और फिर विभागीय जांच शुरू की।
जांच अधिकारी के रूप में वरिष्ठ जिला पंजीयक जबलपुर पवन अहिरवार को नियुक्त किया गया था। जांच में उपलब्ध दस्तावेजों और रिकॉर्ड के आधार पर आरोप सही पाए गए।
जांच में क्या सामने आया?
जांच रिपोर्ट के अनुसार परिहार की तीसरी संतान अभिषेक सिंह का जन्म 19 नवंबर 2003 को हुआ था। कलेक्टर सिंगरौली की संयुक्त जांच समिति की रिपोर्ट, जन्म प्रमाण संबंधी दस्तावेज और अन्य अभिलेखों के आधार पर यह तथ्य प्रमाणित माना गया।
जांच अधिकारी ने 9 दिसंबर 2025 को अपनी रिपोर्ट में परिहार को दोषी ठहराया था, जिसके बाद पंजीयन विभाग ने बर्खास्तगी का आदेश जारी कर दिया।
CM मोहन यादव ने क्या कहा था?
9 जून को मुख्यमंत्री Mohan Yadav ने सामान्य प्रशासन विभाग (GAD) के उस मसौदा प्रावधान को निरस्त करने के निर्देश दिए थे, जिसमें दो से अधिक जीवित संतान वाले उम्मीदवारों को सरकारी सेवा के लिए अयोग्य घोषित करने का प्रस्ताव रखा गया था।
मुख्यमंत्री ने संबंधित ड्राफ्ट को पोर्टल से हटाने और संशोधित प्रस्ताव तैयार करने के निर्देश भी दिए थे। इसके बाद माना जा रहा था कि ऐसे मामलों में कर्मचारियों को राहत मिल सकती है।
विभाग ने क्यों की कार्रवाई?
पंजीयन विभाग का कहना है कि मुख्यमंत्री की घोषणा के अनुरूप अभी तक कोई नया शासकीय आदेश या अधिसूचना जारी नहीं हुई है। ऐसे में विभाग ने मौजूदा सेवा नियमों के तहत कार्रवाई की है।
यानी जब तक नियमों में औपचारिक संशोधन नहीं होता, तब तक विभाग पुराने प्रावधानों के अनुसार निर्णय लेने के लिए बाध्य है।
अफसर ने दी थी यह सफाई
अशोक सिंह परिहार ने अपने जवाब में कहा था कि उन्हें दो से अधिक संतान संबंधी नियम की जानकारी नहीं थी और विभाग द्वारा भी इस संबंध में कोई विशेष जानकारी नहीं दी गई थी।
हालांकि विभाग ने इस तर्क को स्वीकार नहीं किया। आदेश में कहा गया कि परिहार वर्ष 1992 से नियमित शासकीय सेवा में थे, इसलिए यह मानना संभव नहीं है कि उन्हें सेवा नियमों की जानकारी नहीं थी।
अब उठ रहे हैं बड़े सवाल
इस कार्रवाई के बाद कई महत्वपूर्ण सवाल सामने आ रहे हैं:
- क्या मुख्यमंत्री की घोषणा केवल भविष्य की भर्तियों के लिए थी?
- क्या वर्तमान कर्मचारियों पर भी इसका प्रभाव पड़ना था?
- यदि सरकार नियम बदलने की तैयारी में थी तो विभागों को स्पष्ट अंतरिम निर्देश क्यों नहीं दिए गए?
- क्या नियमों में बदलाव की प्रक्रिया पूरी होने तक ऐसी कार्रवाई रोकी जा सकती थी?
आगे क्या हैं कानूनी विकल्प?
बर्खास्तगी के बाद अशोक सिंह परिहार के पास विभागीय अपील दायर करने का अधिकार है। इसके अलावा वे इस फैसले को चुनौती देने के लिए अदालत, विशेषकर Madhya Pradesh High Court का रुख भी कर सकते हैं।
निष्कर्ष: यह मामला केवल एक अधिकारी की बर्खास्तगी तक सीमित नहीं है, बल्कि शासन की घोषणाओं और प्रशासनिक प्रक्रियाओं के बीच समन्वय के सवाल को भी सामने लाता है। एक ओर सरकार नियमों में बदलाव के संकेत देती है, वहीं दूसरी ओर विभाग पुराने प्रावधानों के आधार पर कार्रवाई करता है। आने वाले दिनों में यह मामला कानूनी और राजनीतिक दोनों स्तरों पर चर्चा का केंद्र बन सकता है।




