जमीन, सिस्टम और सवाल: 1,500 एकड़ ट्राइबल लैंड ट्रांसफर पर 9 IAS घेरे में
मध्यप्रदेश विधानसभा में खुलासा—9 आईएएस अफसरों ने कलेक्टर रहते आदिवासियों की करीब 1500 एकड़ जमीन गैर आदिवासियों को बेचने की अनुमति दी। इंदौर, खंडवा, धार समेत कई जिलों के आंकड़े सामने।

भोपाल. मध्यप्रदेश में आदिवासी जमीन के सौदों को लेकर बड़ा खुलासा हुआ है। कलेक्टर और अपर कलेक्टर के पद पर रहते हुए 9 आईएएस अधिकारियों ने आदिवासियों की करीब 1500 एकड़ जमीन गैर आदिवासियों को बेचने की अनुमति दी थी। यह जानकारी गुरुवार को विधानसभा में कांग्रेस विधायक बाला बच्चन के सवाल के लिखित जवाब में राजस्व मंत्री करण सिंह वर्मा ने दी। सबसे ज्यादा मामले इंदौर जिले से सामने आए हैं, जहां लगभग 500 एकड़ आदिवासी जमीन के हस्तांतरण को मंजूरी दी गई।
इंदौर में 6 कलेक्टरों ने दीं बड़ी संख्या में अनुमतियां
विधानसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक इंदौर में बड़े मामलों में छह अलग-अलग कलेक्टरों के कार्यकाल में ये अनुमतियां दी गईं।
- 28 मामलों में सीधे कलेक्टर स्तर से अनुमति
- 72 मामलों में अपर कलेक्टर स्तर से मंजूरी
- इस खुलासे ने प्रशासनिक प्रक्रिया और भूमि हस्तांतरण की वैधता को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं।
खंडवा में सबसे ज्यादा जमीन ट्रांसफर
खंडवा जिले में वर्ष 2009 से 2023 के बीच सबसे ज्यादा 288.631 हेक्टेयर आदिवासी जमीन गैर आदिवासियों को बेचने की अनुमति दी गई। हालांकि सरकार ने इस अवधि में पदस्थ कलेक्टरों के नाम सार्वजनिक नहीं किए हैं।
बड़वानी, खरगोन और धार में भी बड़ी संख्या में मामले
राज्य के अन्य आदिवासी बहुल जिलों में भी जमीन हस्तांतरण के मामले सामने आए हैं –
- बड़वानी – 4 प्रकरण
- खरगोन – 11 प्रकरण
- धार – 143 प्रकरण
इन जिलों में अनुमति देने वाले कलेक्टरों के नाम भी जवाब में नहीं बताए गए।
इन अफसरों के नाम सामने आए
जिन आईएएस अधिकारियों द्वारा जमीन बिक्री की अनुमति दिए जाने की जानकारी दी गई है, उनमें शामिल हैं –
- राकेश श्रीवास्तव – 9.94 हेक्टेयर
- राघवेंद्र सिंह – 2.25 हेक्टेयर
- पी. नरहरि – 6.20 हेक्टेयर
- इलैया राजा टी – 1 हेक्टेयर
- निशांत वरवड़े – 2.5 हेक्टेयर
- आनंद शर्मा – 1.25 हेक्टेयर
- रवींद्र सिंह – 1.92 हेक्टेयर
- आशुतोष अवस्थी – 192 हेक्टेयर
- जे.पी. आइरिन – 4 हेक्टेयर
उठ रहे बड़े सवाल
इस पूरे मामले के सामने आने के बाद आदिवासी जमीन संरक्षण कानूनों के पालन, अनुमति प्रक्रिया की पारदर्शिता और प्रशासनिक जवाबदेही को लेकर राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष ने इसे आदिवासी हितों से जुड़ा गंभीर मुद्दा बताते हुए विस्तृत जांच की मांग के संकेत दिए हैं।




