ईरान वार्ता के बीच अमेरिका-इज़रायल रिश्तों में तनाव, जासूसी के आरोपों ने बढ़ाई खुफिया एजेंसियों की चिंता
ईरान वार्ता के बीच इज़रायली एजेंसियों पर अमेरिकी अधिकारियों की कथित जासूसी के आरोप लगे हैं। रिपोर्ट्स के मुताबिक इससे अमेरिका-इज़रायल खुफिया संबंधों में नई चिंता पैदा हुई है।

वाशिंगटन. मिडिल ईस्ट में जारी तनाव और ईरान को लेकर चल रही कूटनीतिक कोशिशों के बीच अमेरिका और इज़रायल के रिश्तों में नई खटास की खबर सामने आई है। मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, इज़रायली खुफिया एजेंसियों पर ईरान के साथ शांति समझौते के लिए प्रयासरत अमेरिकी अधिकारियों की निगरानी और जासूसी करने के आरोप लगे हैं। इन दावों ने अमेरिकी खुफिया तंत्र में गंभीर चिंता पैदा कर दी है और दोनों सहयोगी देशों के बीच भरोसे को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
अमेरिकी वार्ताकारों पर निगरानी के आरोप
रिपोर्ट्स के मुताबिक हालिया अमेरिकी खुफिया आकलनों में संकेत मिले हैं कि इज़रायल ने अमेरिका और ईरान के बीच चल रही वार्ताओं से जुड़ी संवेदनशील जानकारी जुटाने के प्रयास तेज कर दिए हैं। बताया जा रहा है कि निगरानी के दायरे में शामिल प्रमुख अमेरिकी अधिकारी हैं:
कथित तौर पर निगरानी में रहे अधिकारी:
- स्टीव विटकॉफ (राष्ट्रपति ट्रंप के मुख्य वार्ताकार)
- एलब्रिज कोल्बी (पेंटागन नीति प्रमुख)
- माइकल डिमिनो (वरिष्ठ रक्षा अधिकारी)
खुफिया अधिकारियों को आशंका है कि वार्ता की रणनीति और अमेरिकी रुख को समझने के लिए इन अधिकारियों की गतिविधियों पर नजर रखी जा रही थी।
अमेरिकी एजेंसियों ने बढ़ाई सतर्कता
अमेरिकी रक्षा और खुफिया एजेंसियों ने कथित जासूसी गतिविधियों को गंभीरता से लिया है। रिपोर्ट के अनुसार:
- डिफेंस इंटेलिजेंस एजेंसी (DIA) सहित कई एजेंसियों ने खतरे के स्तर का पुनर्मूल्यांकन किया।
- इज़रायल से जुड़े काउंटर-इंटेलिजेंस खतरे को “हाई” से बढ़ाकर “क्रिटिकल” श्रेणी में रखा गया।
- अमेरिकी सैन्य और सरकारी अधिकारियों पर जानकारी जुटाने के प्रयासों को लेकर विशेष निगरानी बढ़ाई गई।
फोन टैपिंग और डिजिटल निगरानी के आरोप
रिपोर्ट्स में दावा किया गया है कि कुछ अमेरिकी रक्षा अधिकारियों ने अपने मोबाइल उपकरणों में ऐसे सॉफ्टवेयर की मौजूदगी की आशंका जताई, जो संचार को इंटरसेप्ट करने में सक्षम थे। आरोपों में शामिल बिंदु:
- मोबाइल संचार की निगरानी
- डिजिटल जासूसी के प्रयास
- संवेदनशील सूचनाओं तक पहुंच बनाने की कोशिश
हालांकि इन दावों पर आधिकारिक पुष्टि अभी तक सामने नहीं आई है।
पुराने विवादों का भी हुआ जिक्र
रिपोर्ट में अतीत के कुछ कथित मामलों का भी उल्लेख किया गया है। कथित पुराने घटनाक्रम:
- 2021 में अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठानों के आसपास संदिग्ध निगरानी गतिविधियां
- अमेरिकी सुरक्षा प्रतिष्ठानों में लिसनिंग डिवाइस लगाने के प्रयासों के आरोप
- संवेदनशील सुरक्षा सूचनाओं तक पहुंच बनाने की कोशिशें
इन घटनाओं का जिक्र मौजूदा चिंताओं के संदर्भ में किया जा रहा है।
ईरान को लेकर अमेरिका और इज़रायल की रणनीति में अंतर
विशेषज्ञों का मानना है कि दोनों देशों के बीच तनाव की एक बड़ी वजह ईरान को लेकर अलग-अलग रणनीतिक प्राथमिकताएं हैं।
अमेरिका का उद्देश्य
- ईरान की सैन्य क्षमता को सीमित करना
- कूटनीतिक समझौते के जरिए समाधान तलाशना
- क्षेत्रीय स्थिरता बनाए रखना
इज़रायल का उद्देश्य
- ईरानी सैन्य ढांचे को अधिकतम नुकसान पहुंचाना
- सुरक्षा जोखिमों को पूरी तरह समाप्त करना
- तेहरान के प्रभाव को कमजोर करना
इन अलग-अलग लक्ष्यों के कारण दोनों देशों के बीच रणनीतिक मतभेद उभरते दिखाई दे रहे हैं।
सैन्य और खुफिया सहयोग पर पड़ सकता है असर
जानकारों का मानना है कि यदि ये आरोप और गंभीर रूप लेते हैं, तो अमेरिका और इज़रायल के बीच खुफिया सूचनाओं के आदान-प्रदान पर असर पड़ सकता है। संभावित प्रभाव:
- संवेदनशील जानकारी साझा करने पर अतिरिक्त प्रतिबंध
- संयुक्त सैन्य अभियानों में सतर्कता
- खुफिया सहयोग की समीक्षा
- रणनीतिक समन्वय में नई जटिलताएं
हालांकि दोनों देश अब भी क्षेत्रीय सुरक्षा मामलों में करीबी सहयोगी बने हुए हैं।
मिडिल ईस्ट की राजनीति पर भी पड़ सकते हैं प्रभाव
ईरान, अमेरिका और इज़रायल के बीच बढ़ती कूटनीतिक गतिविधियों के बीच ऐसे आरोप क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित कर सकते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले समय में वार्ताओं की दिशा और दोनों देशों के सुरक्षा संबंध इस मुद्दे से प्रभावित हो सकते हैं।




