हर रिश्ता शादी तक नहीं पहुंचता; सहमति वाले संबंधों पर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध खराब चरित्र का प्रमाण नहीं हैं। तेलंगाना पुलिस भर्ती मामले में अदालत ने उम्मीदवार के पक्ष में महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध किसी व्यक्ति के खराब चरित्र का प्रमाण नहीं हो सकते। अदालत ने यह टिप्पणी तेलंगाना पुलिस कांस्टेबल भर्ती से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान की, जिसमें एक उम्मीदवार की नियुक्ति पुराने आपराधिक मामले के आधार पर रद्द कर दी गई थी।
पुलिस भर्ती मामले में सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप
न्यायमूर्ति मनमोहन और न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने तेलंगाना राज्य स्तरीय पुलिस भर्ती बोर्ड को उम्मीदवार की नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया। उम्मीदवार का चयन पुलिस कांस्टेबल पद के लिए हुआ था, लेकिन एक पुराने मामले के कारण उसकी भर्ती रोक दी गई थी।
क्या था पूरा मामला?
उम्मीदवार के खिलाफ वर्ष 2014 में शादी का वादा कर दुष्कर्म करने का आरोप लगाया गया था। हालांकि बाद में दोनों पक्षों के बीच समझौता हो गया और मामला लोक अदालत में सुलझा लिया गया। इसके बावजूद भर्ती बोर्ड ने उम्मीदवार को “खराब चरित्र” का हवाला देकर नियुक्ति देने से इनकार कर दिया था।
सहमति से बने संबंध को नहीं माना जा सकता खराब चरित्र का आधार
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कहा कि दो अविवाहित वयस्कों के बीच सहमति से बने शारीरिक संबंध अपने आप में किसी व्यक्ति के चरित्र को खराब साबित नहीं करते। अदालत ने कहा कि भारतीय कानून ऐसे संबंधों पर प्रतिबंध नहीं लगाता और केवल इसी आधार पर किसी व्यक्ति की योग्यता या चरित्र पर सवाल नहीं उठाया जा सकता।
हाईकोर्ट के फैसले को भी मिली मंजूरी
उम्मीदवार ने भर्ती बोर्ड के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। शीर्ष अदालत ने उसकी अपील स्वीकार करते हुए तेलंगाना हाईकोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें भर्ती बोर्ड को नियुक्ति पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया गया था।
“हर रिश्ता शादी में तब्दील नहीं होता”
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि हर संबंध का अंत विवाह में हो, यह जरूरी नहीं है। केवल इसलिए कि कोई रिश्ता शादी तक नहीं पहुंचा, यह नहीं माना जा सकता कि किसी पक्ष ने दूसरे को धोखा दिया है या उसका चरित्र खराब है।
चरित्र मूल्यांकन पर सुप्रीम कोर्ट का महत्वपूर्ण संदेश
अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति के चरित्र का आकलन करते समय तथ्यों और परिस्थितियों को ध्यान में रखा जाना चाहिए। केवल पुराने आरोपों या सहमति आधारित व्यक्तिगत संबंधों को आधार बनाकर किसी को रोजगार से वंचित करना उचित नहीं माना जा सकता।




