गर्मी बनी जानलेवा! 2024 में रिकॉर्ड 554 हीटवेव दिन, क्लाइमेट चेंज ने बढ़ाई चिंता
भारत में हीटवेव का खतरा तेजी से बढ़ रहा है। पिछले 13 वर्षों में लू के दिन दोगुने हो गए हैं। जानिए जलवायु परिवर्तन, स्वास्थ्य और अर्थव्यवस्था पर इसके गंभीर प्रभाव।

नई दिल्ली. भारत में जलवायु परिवर्तन का असर अब साफ तौर पर दिखाई देने लगा है। पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 13 वर्षों में देश में हीटवेव (लू) के दिनों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है। जहां 2013 में करीब 100 हीटवेव दिन दर्ज किए गए थे, वहीं अब यह आंकड़ा 200 दिनों के पार पहुंच चुका है। बढ़ती गर्मी, लंबे समय तक रहने वाली लू और रिकॉर्ड तापमान न केवल लोगों की सेहत बल्कि कृषि, जल संसाधनों और अर्थव्यवस्था के लिए भी गंभीर चुनौती बनते जा रहे हैं।
13 साल में दोगुनी हुई हीटवेव की घटनाएं
पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक भारत में हीटवेव के दिनों में लगातार बढ़ोतरी दर्ज की जा रही है। वर्ष 2013 की तुलना में अब हीटवेव की अवधि और तीव्रता दोनों बढ़ चुकी हैं। पहले जहां लू का प्रभाव मुख्य रूप से अप्रैल और मई तक सीमित रहता था, अब मार्च से जून और कई बार जुलाई तक भी इसका असर देखने को मिल रहा है।
2024 में दर्ज हुए रिकॉर्ड 554 हीटवेव दिन
सरकार द्वारा संसद में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2024 में देशभर में 554 हीटवेव दिन दर्ज किए गए, जबकि 2023 में यह संख्या 230 थी। एक ही वर्ष में इतनी बड़ी बढ़ोतरी यह दर्शाती है कि ग्लोबल वार्मिंग और बदलते मौसम चक्र का प्रभाव लगातार गहरा रहा है।
क्या होती है हीटवेव?
भारतीय मौसम विभाग (IMD) के अनुसार, जब किसी क्षेत्र का अधिकतम तापमान सामान्य से 4.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक बढ़ जाए और यह स्थिति लगातार बनी रहे, तो उसे हीटवेव कहा जाता है। मैदानी क्षेत्रों में 40 डिग्री सेल्सियस और पहाड़ी इलाकों में 30 डिग्री सेल्सियस से अधिक तापमान होने पर हीटवेव की स्थिति मानी जाती है।
किन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा असर?
देश के कई हिस्से हीटवेव के नए हॉटस्पॉट बनते जा रहे हैं।
- उत्तर भारत: दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश और बिहार
- पश्चिम भारत: राजस्थान और गुजरात
- मध्य भारत: मध्य प्रदेश और महाराष्ट्र
- दक्षिण भारत: आंध्र प्रदेश और आसपास के क्षेत्र
शहरी इलाकों में ‘अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट’ के कारण रात के समय भी तापमान अधिक बना रहता है, जिससे लोगों को राहत नहीं मिल पाती।
सेहत पर पड़ रहा गंभीर असर
हीटवेव केवल असहनीय गर्मी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह कई गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का कारण बन रही है। हीट स्ट्रोक, डिहाइड्रेशन, हार्ट अटैक और किडनी संबंधी बीमारियों के मामलों में वृद्धि देखी जा रही है। बच्चों, बुजुर्गों, गर्भवती महिलाओं और मजदूर वर्ग पर इसका सबसे अधिक प्रभाव पड़ता है।
कृषि और अर्थव्यवस्था पर भी संकट
बढ़ती गर्मी का असर खेती-किसानी पर भी पड़ रहा है। गेहूं, चावल, फल और सब्जियों की पैदावार प्रभावित हो रही है। भूजल स्तर में गिरावट और जल संकट की समस्या बढ़ रही है। साथ ही बिजली की मांग में तेजी से वृद्धि होने के कारण आर्थिक दबाव भी बढ़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन है सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञों के अनुसार ग्रीनहाउस गैसों का बढ़ता उत्सर्जन, जंगलों की कटाई, तेज शहरीकरण और जीवाश्म ईंधनों का अत्यधिक उपयोग वैश्विक तापमान बढ़ाने के प्रमुख कारण हैं। जलवायु मॉडल संकेत देते हैं कि यदि वर्तमान रुझान जारी रहे तो 2050 तक हीटवेव की आवृत्ति और अवधि दोनों में और अधिक वृद्धि हो सकती है।
खतरे की घंटी है बढ़ती हीटवेव
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत में हीटवेव के दिनों का दोगुना होना जलवायु संकट का स्पष्ट संकेत है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह समस्या और अधिक गंभीर रूप ले सकती है। हीटवेव अब केवल मौसमी घटना नहीं, बल्कि बदलती जलवायु की स्थायी चुनौती बनती जा रही है।




