बिहारराज्य

बैटरी कचरे से निकलेगा ‘काला सोना’, जमशेदपुर के CSIR-NML की स्वदेशी तकनीक बनेगी गेमचेंजर

जमशेदपुर के CSIR-NML ने बैटरी कचरे से लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसी कीमती धातुएं निकालने के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित की है। यह पहल ई-वेस्ट प्रबंधन और आत्मनिर्भर भारत मिशन को नई मजबूती देगी।

इलेक्ट्रिक वाहनों, मोबाइल फोन और लैपटॉप के बढ़ते इस्तेमाल के साथ लिथियम-आयन बैटरियों का कचरा भी तेजी से बढ़ रहा है। इस चुनौती को अवसर में बदलने के लिए जमशेदपुर स्थित CSIR-राष्ट्रीय धातुकर्म प्रयोगशाला (CSIR-NML) ने एक महत्वपूर्ण पहल की है। संस्थान ने बेंगलुरु की कंपनी CirQure Private Limited के साथ समझौता कर ऐसी स्वदेशी तकनीक विकसित की है, जिसके जरिए बेकार हो चुकी बैटरियों से लिथियम, कोबाल्ट और अन्य कीमती धातुओं को दोबारा निकाला जा सकेगा।

बैटरी कचरे से निकलेगा ‘काला सोना’

CSIR-NML और CirQure Private Limited के बीच हुए समझौता ज्ञापन (MoU) के तहत लिथियम-आयन बैटरियों के रिसाइक्लिंग की उन्नत तकनीक को व्यावसायिक स्तर पर बढ़ावा दिया जाएगा।

विशेषज्ञों के अनुसार, पुरानी बैटरियों के अंदर मौजूद ब्लैक मास (Black Mass) को अक्सर ‘काला सोना’ कहा जाता है, क्योंकि इसमें कई महंगी और रणनीतिक धातुएं मौजूद होती हैं। नई तकनीक की मदद से इन्हें सुरक्षित तरीके से दोबारा प्राप्त किया जा सकेगा।

पूरी तरह स्वदेशी तकनीक की खासियत

CSIR-NML द्वारा विकसित यह तकनीक पूरी तरह भारत में विकसित की गई है। इसके जरिए कबाड़ हो चुकी बैटरियों से निम्नलिखित महत्वपूर्ण धातुओं और पदार्थों को निकाला जा सकेगा:

  • लिथियम
  • कोबाल्ट
  • निकेल
  • मैंगनीज
  • तांबा
  • एल्युमिनियम
  • ग्रेफाइट

यह प्रक्रिया न केवल आर्थिक रूप से लाभकारी होगी, बल्कि पर्यावरण के लिए भी सुरक्षित मानी जा रही है।

विदेशी आयात पर घटेगी निर्भरता

भारत वर्तमान में लिथियम, कोबाल्ट और निकेल जैसी रणनीतिक धातुओं के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। इलेक्ट्रिक वाहन उद्योग के विस्तार के साथ इन धातुओं की मांग लगातार बढ़ रही है।

CSIR-NML के निदेशक Dr. Sandeep Ghosh Chowdhury और मुख्य वैज्ञानिक Dr. Manish Kumar Jha के मार्गदर्शन में विकसित यह तकनीक पुराने बैटरी कचरे को कच्चे माल के वैकल्पिक स्रोत में बदल सकती है। इससे देश को:

  • आयात खर्च कम करने में मदद मिलेगी।
  • रणनीतिक धातुओं की घरेलू उपलब्धता बढ़ेगी।
  • ईवी उद्योग को स्थायी सप्लाई चेन मिलेगी।

पर्यावरण संरक्षण को मिलेगा बढ़ावा

विशेषज्ञों का मानना है कि लिथियम-आयन बैटरियों का गलत निपटान पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। ऐसे में यह तकनीक बैटरी कचरे के सुरक्षित प्रबंधन का प्रभावी समाधान प्रदान करती है। इस पहल से:

  • खतरनाक ई-वेस्ट कम होगा।
  • प्राकृतिक संसाधनों पर दबाव घटेगा।
  • कार्बन फुटप्रिंट कम करने में मदद मिलेगी।
  • सर्कुलर इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा।

‘आत्मनिर्भर भारत’ मिशन को मिलेगी मजबूती

समझौते के दौरान CirQure Private Limited के निदेशक Srikumar Vachaspati ने कहा कि उद्योग जगत को लंबे समय से ऐसी तकनीक की आवश्यकता थी। विशेषज्ञों के अनुसार यह परियोजना प्रधानमंत्री के ‘आत्मनिर्भर भारत’ विजन को भी मजबूती देगी, क्योंकि इससे देश में महत्वपूर्ण खनिजों की घरेलू रिकवरी और उपयोग बढ़ेगा।

भारत के लिए क्यों है महत्वपूर्ण?

भारत दुनिया के सबसे बड़े ईवी बाजारों में से एक बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है। आने वाले वर्षों में लाखों बैटरियां अपनी उपयोग अवधि पूरी करेंगी। ऐसे में बैटरी रिसाइक्लिंग तकनीक न केवल पर्यावरणीय जरूरत है, बल्कि आर्थिक और रणनीतिक दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण है।

CSIR-NML की यह पहल भारत को बैटरी रिसाइक्लिंग और महत्वपूर्ण खनिज पुनर्प्राप्ति (Critical Mineral Recovery) के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर नई पहचान दिला सकती है।

Republic News Desk

इस समाचार पोर्टल के लेखक एवं संपादक हैं। दस वर्षों की पत्रकारिता अनुभव से सत्य और संतुलित खबरें पेश करने का जुनून रखते हैं। अपनी टीम के साथ राजनीति, टेक्नोलॉजी, क्राइम और संस्कृति की गहरी कवरेज देते हैं। पाठकों का विश्वास ही इनका मिशन है।

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