ममता पर कांग्रेस का ‘डबल गेम’? दिल्ली में गले मिलना, बंगाल में खुली सियासी जंग
INDIA ब्लॉक में कांग्रेस और ममता बनर्जी की नजदीकी के बावजूद पश्चिम बंगाल में दोनों दलों के बीच राजनीतिक टकराव जारी है। जानिए दिल्ली और बंगाल की अलग-अलग राजनीति का पूरा समीकरण।
नई दिल्ली. INDIA ब्लॉक की हालिया बैठक में ममता बनर्जी और सोनिया गांधी की गर्मजोशी भरी मुलाकात ने विपक्षी एकजुटता की तस्वीर पेश की। लेकिन सवाल यह है कि क्या दिल्ली में दिख रही यह दोस्ती पश्चिम बंगाल की राजनीति में भी नजर आती है? हकीकत यह है कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस (TMC) के रिश्ते राष्ट्रीय राजनीति और बंगाल की सियासत में बिल्कुल अलग-अलग दिखाई देते हैं। एक तरफ संसद और विपक्षी मंचों पर दोनों दल साथ खड़े नजर आते हैं, वहीं बंगाल में दोनों के बीच राजनीतिक संघर्ष लगातार जारी है।
INDIA ब्लॉक की बैठक में दिखी नजदीकी
दिल्ली में हुई INDIA ब्लॉक की बैठक में ममता बनर्जी को सोनिया गांधी के ठीक बगल में बैठाया गया। बैठक के दौरान दोनों नेताओं की मुलाकात और बातचीत ने विपक्षी एकता का संदेश दिया। ऐसे समय में जब पश्चिम बंगाल की राजनीति में तृणमूल कांग्रेस कई चुनौतियों का सामना कर रही है, कांग्रेस का यह समर्थन ममता बनर्जी के लिए राहत भरा माना जा रहा है।
2024 लोकसभा चुनाव से शुरू हुई दूरी
2024 लोकसभा चुनाव से पहले ममता बनर्जी ने स्पष्ट कर दिया था कि तृणमूल कांग्रेस बंगाल में अकेले चुनाव लड़ेगी। हालांकि उन्होंने INDIA ब्लॉक से अलग होने का ऐलान नहीं किया। चुनाव के दौरान कांग्रेस और TMC के बीच कोई औपचारिक गठबंधन नहीं था, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर दोनों दल भाजपा के खिलाफ एक ही मंच पर बने रहे।
इसी दौरान तृणमूल कांग्रेस ने कांग्रेस नेता अधीर रंजन चौधरी के खिलाफ पूर्व क्रिकेटर इरफान पठान को मैदान में उतार दिया, जिससे कांग्रेस को बड़ा राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा।
दिल्ली में सहयोग, बंगाल में मुकाबला
दिल्ली की राजनीति में राहुल गांधी और कांग्रेस नेतृत्व अक्सर ममता बनर्जी के साथ तालमेल बनाते दिखाई देते हैं। स्पीकर चुनाव से लेकर विपक्षी रणनीति तक कई मुद्दों पर कांग्रेस ने TMC को साथ रखने की कोशिश की।
लेकिन पश्चिम बंगाल में तस्वीर पूरी तरह अलग है। विधानसभा चुनावों और स्थानीय राजनीति में कांग्रेस लगातार ममता सरकार पर भ्रष्टाचार, प्रशासनिक विफलताओं और भाजपा को अप्रत्यक्ष लाभ पहुंचाने जैसे आरोप लगाती रही है।
राहुल गांधी के निशाने पर रहीं ममता बनर्जी
पश्चिम Bengal चुनाव प्रचार के दौरान राहुल गांधी ने ममता बनर्जी पर तीखे हमले किए। उन्होंने सवाल उठाया कि जिस तरह विपक्षी नेताओं पर केंद्रीय एजेंसियों की कार्रवाई होती है, वैसी कार्रवाई ममता बनर्जी के खिलाफ क्यों नहीं होती।
राहुल गांधी ने सार्वजनिक मंचों से भ्रष्टाचार और लोकतांत्रिक संस्थाओं के दुरुपयोग जैसे मुद्दों पर TMC सरकार को घेरा। यह रुख दिल्ली में दिखाई देने वाले सहयोगी रिश्तों से बिल्कुल अलग नजर आया।
अधीर रंजन चौधरी की आक्रामक लाइन
कांग्रेस की बंगाल इकाई लंबे समय से तृणमूल कांग्रेस के खिलाफ सबसे मुखर रही है। पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अधीर रंजन चौधरी लगातार ममता बनर्जी पर हमला बोलते रहे हैं। हाल ही में उन्होंने यहां तक कह दिया कि ममता बनर्जी को कांग्रेस में लौटकर तृणमूल कांग्रेस का विलय कर देना चाहिए। यह बयान दर्शाता है कि बंगाल कांग्रेस और केंद्रीय कांग्रेस नेतृत्व की राजनीतिक रणनीति में स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।
विपक्षी राजनीति की मजबूरी या रणनीति?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस के बीच संबंध ‘प्रतिस्पर्धा और सहयोग’ के मॉडल पर चल रहे हैं। राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के खिलाफ एकजुटता बनाए रखना दोनों दलों की राजनीतिक जरूरत है, जबकि बंगाल में दोनों का वोट बैंक और राजनीतिक आधार एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं। यही वजह है कि दिल्ली में दोनों दल सहयोगी नजर आते हैं, जबकि कोलकाता में राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी बने रहते हैं।
आगे क्या?
पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों के बाद राजनीतिक समीकरण बदल चुके हैं। कांग्रेस, TMC, आम आदमी पार्टी और अन्य विपक्षी दल अब नए राजनीतिक संतुलन की तलाश में हैं। ऐसे में INDIA ब्लॉक की एकता और राज्यों में क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस के रिश्ते आने वाले समय में विपक्ष की राजनीति की दिशा तय करेंगे।
फिलहाल तस्वीर साफ है—दिल्ली में कांग्रेस और ममता बनर्जी साथ दिख रही हैं, लेकिन बंगाल की जमीन पर दोनों के बीच सियासी संघर्ष अभी खत्म नहीं हुआ है।




