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60 साल में दोगुनी हुई मांस खपत, UN रिपोर्ट बोली- धरती पर बढ़ रहा प्रदूषण और जलवायु संकट

UN की FAO रिपोर्ट के अनुसार पिछले 60 वर्षों में मांस की खपत दोगुनी हो गई है। विशेषज्ञों ने बढ़ते पशुपालन, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन को लेकर चिंता जताई है।

नई दिल्ली. दुनियाभर में बदलती खानपान की आदतों ने पर्यावरण विशेषज्ञों की चिंता बढ़ा दी है। संयुक्त राष्ट्र की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, पिछले छह दशकों में मांस की खपत में तेज बढ़ोतरी हुई है, जिससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियां और गंभीर होती जा रही हैं। रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि यदि उत्पादन और खपत के मौजूदा रुझान जारी रहे, तो पर्यावरण पर इसका असर और गहरा हो सकता है।

60 साल में दोगुनी हुई मांस की खपत

संयुक्त राष्ट्र की खाद्य एवं कृषि संस्था (FAO) की रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 1961 में प्रति व्यक्ति वार्षिक मांस उपलब्धता औसतन 25 किलोग्राम थी, जो 2022 तक बढ़कर 47 किलोग्राम प्रति व्यक्ति पहुंच गई।

यह आंकड़ा दर्शाता है कि दुनिया भर में मांस आधारित खाद्य पदार्थों की मांग लगातार बढ़ रही है और लोगों की डाइट में इसका हिस्सा पहले की तुलना में कहीं अधिक हो गया है।

चिकन की मांग में सबसे ज्यादा उछाल

रिपोर्ट के अनुसार, चिकन की खपत में सबसे ज्यादा वृद्धि दर्ज की गई है।

प्रमुख आंकड़े

  • 1961 में प्रति व्यक्ति चिकन खपत: 3 किलोग्राम से कम
  • 2022 में प्रति व्यक्ति चिकन खपत: 17 किलोग्राम
  • लगभग 6 गुना वृद्धि

विशेषज्ञों का मानना है कि अपेक्षाकृत कम कीमत, आसान उपलब्धता और बदलती जीवनशैली के कारण चिकन की मांग तेजी से बढ़ी है।

पोर्क और बीफ की खपत का ट्रेंड

रिपोर्ट के मुताबिक:

  • पोर्क की खपत लगभग दोगुनी होकर 15 किलोग्राम प्रति व्यक्ति तक पहुंच गई है।
  • बीफ की वैश्विक खपत अपेक्षाकृत स्थिर रही और औसतन 9 किलोग्राम प्रति व्यक्ति के आसपास बनी हुई है।

मांस की बढ़ती मांग के पीछे क्या हैं कारण?

विशेषज्ञों के अनुसार, बढ़ती आय, शहरीकरण और बदलती जीवनशैली इस बदलाव के प्रमुख कारण हैं।

मुख्य वजहें

  • आर्थिक विकास
  • शहरी आबादी में वृद्धि
  • खानपान की पश्चिमी शैली का प्रभाव
  • बढ़ती क्रय शक्ति
  • फूड इंडस्ट्री का विस्तार

इन कारकों ने दुनिया के कई देशों में मांस की मांग को नई ऊंचाइयों तक पहुंचाया है।

पर्यावरण पर बढ़ रहा दबाव

रिपोर्ट में कहा गया है कि कृषि और पशुपालन क्षेत्र वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

चिंता के प्रमुख बिंदु

  • पशुपालन से मीथेन गैस का उत्सर्जन
  • भूमि और जल संसाधनों पर दबाव
  • वनों की कटाई में वृद्धि
  • जैव विविधता पर असर

विशेषज्ञों का मानना है कि बढ़ती पशुधन आधारित उत्पादन प्रणाली जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों को और जटिल बना सकती है।

अमीर और गरीब देशों के बीच बढ़ती खाई

रिपोर्ट में खाद्य असमानता का मुद्दा भी उठाया गया है। जहां विकसित देशों में मांस और पौष्टिक भोजन की उपलब्धता अधिक है, वहीं कई निम्न आय वाले देशों में आज भी कुपोषण और खाद्य असुरक्षा गंभीर समस्या बनी हुई है। इस असमानता को दूर करने के लिए संतुलित और टिकाऊ खाद्य प्रणालियों की आवश्यकता बताई गई है।

FAO की क्या है सिफारिश?

रिपोर्ट में मांस की खपत पर सीधे प्रतिबंध की बात नहीं कही गई है। इसके बजाय FAO ने निम्न उपायों पर जोर दिया है:

  • टिकाऊ कृषि पद्धतियों को बढ़ावा
  • खाद्य अपव्यय में कमी
  • आधुनिक तकनीक का उपयोग
  • पशुपालन क्षेत्र की दक्षता बढ़ाना
  • पर्यावरणीय प्रभाव कम करने वाले उपाय अपनाना

वैज्ञानिकों की अलग राय

कुछ पर्यावरण वैज्ञानिकों का मानना है कि विकसित देशों में मांस की अत्यधिक खपत को कम करना जलवायु परिवर्तन की गति को धीमा करने में मदद कर सकता है। वे प्लांट-बेस्ड डाइट और टिकाऊ खाद्य विकल्पों को बढ़ावा देने की वकालत कर रहे हैं।

हालांकि, इस विषय पर वैश्विक स्तर पर अलग-अलग मत हैं और नीति निर्धारक संतुलित समाधान तलाशने की दिशा में काम कर रहे हैं।

जलवायु और खाद्य सुरक्षा के बीच संतुलन की चुनौती

विशेषज्ञों का कहना है कि आने वाले वर्षों में सबसे बड़ी चुनौती खाद्य सुरक्षा और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की होगी। बढ़ती आबादी को पर्याप्त पोषण उपलब्ध कराने के साथ-साथ धरती के संसाधनों की रक्षा करना भी उतना ही जरूरी होगा।

Republic News Desk

इस समाचार पोर्टल के लेखक एवं संपादक हैं। दस वर्षों की पत्रकारिता अनुभव से सत्य और संतुलित खबरें पेश करने का जुनून रखते हैं। अपनी टीम के साथ राजनीति, टेक्नोलॉजी, क्राइम और संस्कृति की गहरी कवरेज देते हैं। पाठकों का विश्वास ही इनका मिशन है।

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