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गरिमा और अधिकार की बात: सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी, प्रवासी हिंदुओं के जीवन पर ज़ोर

सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान से आए अनुसूचित जाति के हिंदू शरणार्थियों के विस्थापन पर रोक लगाते हुए कहा कि नागरिकता के साथ सम्मानजनक जीवन और आवास देना सरकार की जिम्मेदारी है।

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने पाकिस्तान से भारत आए अनुसूचित जाति के हिंदू शरणार्थियों की स्थिति पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा है कि केवल नागरिकता देना पर्याप्त नहीं है, बल्कि सरकार की जिम्मेदारी है कि उन्हें गरिमापूर्ण जीवन के लिए आवास भी उपलब्ध कराया जाए। यह टिप्पणी दिल्ली के मजनू का टीला इलाके में रह रहे शरणार्थियों के संभावित विस्थापन के संदर्भ में आई है।

मजनू का टीला कैंप पर मंडरा रहा विस्थापन का खतरा

ये शरणार्थी सिग्नेचर ब्रिज के पास यमुना फ्लडप्लेन क्षेत्र में अस्थायी झुग्गी-झोपड़ियों में रह रहे हैं। दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) और अन्य एजेंसियां इसे अवैध अतिक्रमण बताते हुए हटाने की तैयारी कर रही थीं। इससे पहले मई 2025 में दिल्ली हाईकोर्ट ने हटाने का रास्ता साफ किया था, जिसके खिलाफ प्रभावित परिवारों ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।

केंद्र सरकार और डीडीए को नोटिस

मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट की पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और एन. कोटेश्वर सिंह शामिल हैं, ने की। कोर्ट ने केंद्र सरकार और दिल्ली विकास प्राधिकरण को नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह के भीतर जवाब मांगा है। साथ ही, शरणार्थियों को फिलहाल विस्थापित करने की किसी भी कार्रवाई पर रोक लगा दी गई है।

अनुच्छेद 21 के तहत आश्रय भी अधिकार

पीठ ने स्पष्ट किया कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और गरिमा के अधिकार में केवल नागरिकता ही नहीं, बल्कि सम्मानजनक जीवन और आवास का अधिकार भी शामिल है। अदालत ने सरकार से सवाल किया कि नागरिकता दिए जाने के बाद भी इन लोगों के पुनर्वास या वैकल्पिक आवास की व्यवस्था क्यों नहीं की गई।

250 से अधिक परिवार, आजीविका पर भी संकट

बताया गया कि इस क्षेत्र में लगभग 250 से 260 परिवार, यानी करीब 800 से 1200 लोग रह रहे हैं। इनमें से अधिकांश लोग मजदूरी, घरेलू कामकाज और छोटे-मोटे रोजगार से अपनी आजीविका चलाते हैं।

शरणार्थियों का कहना है कि पाकिस्तान में उन्हें धार्मिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ा और ‘काफिर’ कहकर अपमानित किया गया। भारत आने के बाद भी शुरुआत में संदेह झेलना पड़ा, और अब नागरिकता मिलने के बावजूद बेघर होने का डर उन्हें सता रहा है।

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