धर्म

कर्मों की गूंज: पूर्वजन्मों का असर आज के जीवन में

ज्योतिष शास्त्र में विषयोग को पूर्वजन्म के कर्मों से जुड़ा प्रभावशाली योग माना गया है। शनि–चंद्र युति से बनने वाले इस योग के जीवन पर प्रभाव, प्राचीन ग्रंथों में वर्णन और मातृहंता योग की अवधारणा जानिए।

नई दिल्ली. ज्योतिष शास्त्र के अनुसार विषयोग पूर्वजन्मों के शुभ–अशुभ कर्मों का परिणाम माना जाता है। मान्यता है कि किसी जातक की जन्मकुंडली में यदि शनि और चंद्रमा एक साथ स्थित हों, तो यह महान शुभ–अशुभ फल देने वाला विषयोग बनाता है। यह योग जन्मकाल से लेकर मृत्यु पर्यंत अपने प्रभाव दिखाता है और इसे ज्योतिष के सर्वाधिक प्रभावशाली योगों में गिना जाता है।

शनि–चंद्र की युति से बनने वाला प्रभावशाली योग

विषयोग को मानव द्वारा पूर्व जन्मों में नारी के प्रति किए गए कठोर एवं अशोभनीय आचरण से जोड़ा जाता है। ऐसी मान्यता है कि इस योग में जन्म लेने वाला जातक अपने ही मित्रों और संबंधियों द्वारा ठगे जाने की स्थितियों से गुजरता है। यह भी कहा गया है कि ऐसे जातक दूसरों की सहायता तो करते हैं, लेकिन बदले में उन्हें अपयश या कृतघ्नता ही मिलती है।

प्राचीन ग्रंथों में विषयोग का विस्तृत वर्णन

ज्योतिष के महान ग्रंथों — नारद पुराण, जातक भरणम, बृहद्जातक और फलदीपिका — में विषयोग की अशुभता का विस्तार से वर्णन मिलता है। हालांकि, कुंडली में शनि और चंद्रमा की स्थिति, राशि और भाव के अनुसार कुछ हद तक राहत या शमन की संभावनाएं भी बताई गई हैं।

जिस भाव में बने विषयोग, उसी से मिलते हैं कष्ट

ज्योतिषीय फलित के अनुसार, कुंडली के जिस भाव में विषयोग बनता है, जातक को उसी भाव से संबंधित कष्टों का सामना करना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर—

  • यदि यह योग धन भाव में हो, तो आर्थिक परेशानियां
  • यदि पारिवारिक भाव में हो, तो पारिवारिक तनाव
  • यदि स्वास्थ्य भाव में हो, तो दीर्घकालिक मानसिक या शारीरिक दबाव
  • फलित वाचन में यह भी देखा गया है कि अष्टकवर्ग के द्रेष्काण से इसका सूक्ष्म विश्लेषण अधिक स्पष्ट रूप से किया जा सकता है।

मातृहंता योग की अवधारणा

  • ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, पूर्व जन्मों में जिस स्त्री को जातक ने कष्ट दिया होता है, वही प्रतिशोध स्वरूप उसकी माता के रूप में जन्म लेती है।
  • यदि मां की कुंडली में शुभत्व प्रबल हो, तो वह पुत्र की कमाई का धन स्वास्थ्य, विलासिता या अन्य संतानों पर व्यय कराती है, जिससे जातक को दरिद्रता और दुख का सामना करना पड़ता है।
  • यदि पुत्र की कुंडली में शुभत्व अधिक प्रबल हो, तो जन्म के बाद माता की शीघ्र मृत्यु हो जाती है।
  • कुछ मान्यताओं में नवजात की अल्पायु भी इसी योग से जोड़ी जाती है।
  • इसी कारण विषयोग को कई विद्वान मातृहंता योग भी कहते हैं।

शनि की स्थिति से अपयश का संकेत

ज्योतिष शास्त्र के अनुसार यदि शनि, चंद्रमा से अधिक अंश में या उससे अगली राशि में स्थित हो, तो जातक को सामाजिक अपयश, मान–सम्मान में कमी और आलोचना का सामना करना पड़ता है।

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