मध्य प्रदेश

MP हाईकोर्ट का बड़ा अवलोकन: सतना की 11.57 एकड़ जमीन बिक्री पर उठे सवाल

सतना. मध्यप्रदेश हाईकोर्ट की एकलपीठ में सुनवाई करते हुए न्यायमूर्ति विवेक जैन ने प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण सिंह द्वारा अपने पुत्र शिव बहादुर सिंह को बेची गई सतना की 11.57 एकड़ भूमि के स्वामित्व को संदेहास्पद माना है। न्यायालय ने कहा कि अपंजीकृत और अपर्याप्त स्टाम्प पर बनी सेल डीड के आधार पर न तो भूमि का वैध स्वामित्व प्राप्त होता है और न ही अस्थायी निषेधाज्ञा दी जा सकती है।

अपंजीकृत सेल डीड से नहीं मिलता स्वामित्व: हाईकोर्ट

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि जिस सेल डीड के आधार पर जमीन बेची गई, वह न तो पंजीकृत थी और न ही पर्याप्त स्टाम्प शुल्क पर तैयार की गई थी। ऐसे दस्तावेजों को कानूनन वैध नहीं माना जा सकता। इसी आधार पर न्यायालय ने अधीनस्थ अपीलीय अदालत के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई अस्थायी रोक को निरस्त कर दिया गया था।

ट्रायल कोर्ट का आदेश जिला अदालत ने किया था निरस्त

मामले में पूर्व मुख्यमंत्री के वारिसों द्वारा दायर याचिका को खारिज करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि जिला अदालत का निर्णय विधिसम्मत है। उल्लेखनीय है कि ट्रायल कोर्ट ने 5 फरवरी 2025 को याचिकाकर्ताओं के पक्ष में अस्थायी निषेधाज्ञा दी थी, जिसे जिला अदालत ने 13 अक्टूबर 2025 को निरस्त कर दिया था।

याचिकाकर्ताओं की दलीलें नहीं मानी गईं

याचिकाकर्ता नर्मदेश्वर प्रताप सिंह, रामेश्वर प्रताप सिंह (निवासी अंबिकापुर, छत्तीसगढ़) और माधवी सिंह (निवासी सतना) की ओर से तर्क दिया गया कि उनके पिता शिव बहादुर सिंह ने वर्ष 1992 में अपने पिता गोविन्द नारायण सिंह से अपंजीकृत सेल डीड के माध्यम से 11.57 एकड़ भूमि खरीदी थी और वे वर्षों से उस पर काबिज हैं। इसी आधार पर स्थायी निषेधाज्ञा की मांग की गई थी, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार नहीं किया।

सेठ मनोहर लाल के वारिसों ने दी थी चुनौती

अदालत के रिकॉर्ड के अनुसार विवादित भूमि के मूल मालिक सेठ मनोहर लाल थे। उनकी कथित पावर ऑफ अटॉर्नी के आधार पर गोविन्द नारायण सिंह ने 8 दिसंबर 1992 को यह भूमि अपने पुत्र को बेची थी। वर्ष 1998 में नामांतरण भी हुआ था।
ट्रायल कोर्ट के आदेश के खिलाफ सेठ मनोहर लाल के वारिसों ने जिला अदालत में अपील की थी, जिसमें उन्हें राहत मिली। इसके बाद पूर्व मुख्यमंत्री के वारिसों ने हाईकोर्ट का रुख किया, जहां उनकी याचिका खारिज कर दी गई।

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