मन नहीं, आत्मा तय करती है सुख का वास्तविक अर्थ
प्रेम, विश्वास और नैतिक मूल्यों से ही सच्चे सुख की प्राप्ति संभव है। जानिए सुख और सुविधा का अंतर, आत्मिक आनंद का महत्व और समाज को सुखी बनाने का मूल मंत्र।
समाज में हर व्यक्ति सुखी रहना चाहता है, लेकिन सुख की प्राप्ति कैसे हो—यह प्रश्न अक्सर मन में उठता है। इसका सबसे सरल और प्रभावी सूत्र है प्रेम। प्रेम वह तत्व है जो प्रेम करने वाले को भी सुखी बनाता है और जिससे प्रेम किया जाता है, उसे भी आनंद की अनुभूति कराता है। प्रेम से ही व्यक्ति और समाज के बीच सामंजस्य स्थापित होता है।
सुख और सुविधा में अंतर समझें
अक्सर लोग सुख और सुविधा को एक ही मान लेते हैं, जबकि दोनों में मूलभूत अंतर है। जो शरीर को आराम पहुंचाए, वह सुविधा है—जैसे अच्छा घर, महंगी कार या एयरकंडीशन कार्यालय।
इसके विपरीत, सुख का संबंध आत्मा से होता है। सत्य बोलना, प्रेम करना, ईमानदारी और नैतिकता के मार्ग पर चलना, संवेदना और अहिंसा का व्यवहार अपनाना—ये सभी आत्मिक सुख प्रदान करते हैं। यही सुख व्यक्ति को भीतर से समृद्ध बनाता है।
आत्मिक सुख से ही बनता है स्वस्थ समाज
आत्मिक सुख ही वह शक्ति है जो व्यक्ति को संतुलित और समाज को समृद्ध बनाती है। जीवन के सफर में नैतिक और मानवीय मूल्यों के प्रति अटूट विश्वास होना आवश्यक है। कहा जाता है, आदमी नहीं चलता, उसका विश्वास चलता है। आत्मविश्वास ही सभी गुणों को एक सूत्र में बांधता है और मनुष्य के व्यक्तित्व को उजागर करता है।
महानता का मापदंड: चरित्र
दुनिया में कोई भी व्यक्ति महंगे वस्त्र, आलीशान मकान, विदेशी कार या धन-वैभव से बड़ा या छोटा नहीं होता। मनुष्य की वास्तविक महानता उसके चरित्र से मापी जाती है। और सुदृढ़ चरित्र उसी का होता है, जिसे स्वयं पर विश्वास होता है।
मनुष्य के भीतर देवत्व और दानवत्व
मनुष्य के भीतर देवत्व भी है और पशुत्व भी। भारतीय संस्कृति का शाश्वत मंत्र ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ समस्त मानवता के कल्याण की कामना करता है। लेकिन जब स्वार्थ और दानवता हावी हो जाती है, तो संबंधों में दरार पड़ जाती है।
एक प्रसंग: स्वार्थ का दुष्परिणाम
पूर्वजों द्वारा लगाए गए वृक्ष एक आंगन में छांव और फल दे रहे थे। समय के साथ स्वार्थ जागा और भाइयों के बीच दीवार खड़ी हो गई। बड़े भाई ने यह सोचकर सभी वृक्ष कटवा दिए कि उनकी छाया का लाभ दूसरों को क्यों मिले, जबकि जमीन उसकी है। इस स्वार्थपूर्ण निर्णय से न केवल पर्यावरण का नुकसान हुआ, बल्कि मानवीय रिश्ते भी टूट गए। यह उदाहरण बताता है कि अधिकारों में छिपा वैमनस्य किस तरह विनाश का कारण बनता है।
भौतिकता नहीं, मानवता सर्वोपरि
वर्तमान समय में हमने जितना पाया है, उससे कहीं अधिक खोया है। भौतिक मूल्य मनुष्य की सुविधा के लिए हैं, मनुष्य उनके लिए नहीं। जब इंसान इस सत्य को समझ लेता है, तब प्रेम, विश्वास और नैतिकता के माध्यम से वह स्वयं भी सुखी रहता है और समाज को भी सुखी बनाता है।




