धर्म

प्रार्थना की शक्ति: आस्था से उजाला, जीवन में नई दिशा

गीता के उपदेशों और महापुरुषों के उदाहरणों के माध्यम से जानिए प्रार्थना की शक्ति, उसका जीवन पर प्रभाव और कैसे सच्ची भक्ति से अभिमान का नाश व आत्मिक शांति प्राप्त होती है।

योगीराज श्रीकृष्ण ने भगवद्गीता के बारहवें अध्याय में भक्त के जिन गुणों का वर्णन किया है, वे आज भी मानव जीवन के लिए मार्गदर्शक हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं—जो पुरुष द्वेषभाव से रहित हो, सभी से मित्रता और दया का भाव रखे, अहंकार का त्याग कर सुख-दुख में समान भाव बनाए रखे, क्षमाशील हो, निरंतर योग का अभ्यास करे और दृढ़ निश्चय से मन-बुद्धि को परमात्मा में अर्पित कर दे—वह भक्त मुझे अति प्रिय है।

ऐसे गुणों के साथ जब मनुष्य ईश्वर के आगे प्रार्थना करता है, तब उसे किसी और के सामने हाथ फैलाने की आवश्यकता नहीं रहती। प्रार्थना से अभिमान नष्ट होता है, मन द्रवित होता है और दृष्टि बदल जाती है। ऐसी भावावस्था में ईश्वर प्रार्थी की प्रार्थना अवश्य सुनता है।

सभी धर्मों का साझा सूत्र: प्रार्थना

संसार के सभी धर्मों में एक तत्व समान है—प्रार्थना। प्रार्थना किसी भी मनुष्य के जीवन की एक महान साधना है। जीवन में जब कठिनाइयाँ आती हैं और मार्ग सूझता नहीं, तब सच्चे मन से की गई प्रार्थना मार्गदर्शन देती है। असाध्य-सी लगने वाली समस्याएँ भी प्रार्थना से समाधान की ओर बढ़ती हैं।

महापुरुषों के जीवन में प्रार्थना का प्रभाव

गांधी, ईसा मसीह, महात्मा बुद्ध, ऋषि दयानंद, पैगंबर मुहम्मद जैसे महापुरुषों ने प्रार्थना की शक्ति से जीवन की कठिन परिस्थितियों पर विजय पाई। महात्मा गांधी का मानना था कि जैसे शरीर के लिए आहार आवश्यक है, वैसे ही आत्मा के लिए ईश्वर की स्तुति, प्रार्थना और उपासना आवश्यक आहार हैं।

सच्ची प्रार्थना का स्वरूप

महर्षियों और महात्माओं के अनुसार सच्ची प्रार्थना वही है, जिसमें भक्त अपने इष्टदेव के समक्ष सहज, सरल और हृदय से निकले उद्गार प्रकट करता है। यह कोई कठिन भाषा या विशेष विधि की मोहताज नहीं। सीधी-सादी भाषा में, मन की बात सीधे परमात्मा से कहना ही सच्ची प्रार्थना है।

हर समय, हर परिस्थिति में ईश्वर स्मरण

अक्सर मनुष्य दुख में ईश्वर को याद करता है, पर यदि सुख-दुख दोनों में स्मरण बना रहे, तो शायद दुख की स्थिति आए ही नहीं। प्रार्थना का कोई निश्चित समय, स्थान या अवसर नहीं होता। जीवन का प्रत्येक क्षण प्रार्थनामय हो जाए तो सुख कभी दूर नहीं जाता। आज के वैज्ञानिक भी मानते हैं कि जब मन और आत्मा निरोग होते हैं, तो शरीर पर उसका सकारात्मक और शीघ्र प्रभाव पड़ता है।

प्रार्थना से उदारता और विश्व मैत्री

सच्चे मन से की गई प्रार्थना मनुष्य के भीतर उदारता उत्पन्न करती है। शत्रु भी अपने-से लगने लगते हैं और सभी लोग बंधु व मित्र समान प्रतीत होते हैं। यही भावना आगे चलकर विश्व मैत्री का रूप ले लेती है। कहा जाता है कि रामकृष्ण परमहंस एकाग्र मन से प्रार्थना कर भावविभोर हो जाते थे—यह वह अलौकिक अवस्था है, जहाँ दूसरों में गुण और स्वयं में दोष दिखाई देने लगते हैं।

अभिमान का क्षय और सात्त्विक भाव

प्रार्थना हमारी दोषपूर्ण वृत्तियों को बदल देती है। रूप, ऐश्वर्य, संतान, पद-प्रतिष्ठा, सुख और विद्या—सब ईश्वर की देन हैं। जब इनका उपयोग त्यागभाव और सेवा के लिए किया जाता है, तो अभिमान स्वतः नष्ट हो जाता है। अभिमान के आते ही सारे गुण ढक जाते हैं, जबकि प्रार्थना उन्हें उजागर करती है।

ईश्वर की प्रसन्नता ही सर्वोच्च प्राप्ति

गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि वह जो कुछ करता है—खाता है, दान देता है, तप करता है—सब कुछ ईश्वर को समर्पित कर दे। जब प्रभु की प्रसन्नता मिल जाती है, तब फिर प्राप्त करने के लिए शेष क्या रह जाता है? सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना सगुण भी हो सकती है और निर्गुण भी—कभी गुणों की कामना, तो कभी दोषों से मुक्ति की याचना।

भावपूर्ण प्रार्थना की ऐतिहासिक मिसाल

इतिहास में भावपूर्ण प्रार्थना के अनेक उदाहरण मिलते हैं। कहा जाता है कि जब बाबर का पुत्र हुमायूं गंभीर रूप से बीमार पड़ा और दवाएँ असफल हो गईं, तब बाबर ने भावभरे हृदय से ईश्वर से प्रार्थना की—पुत्र के बदले अपने प्राण तक अर्पित करने को तत्पर हो गया। परिणामस्वरूप हुमायूं स्वस्थ हुआ और बाबर अस्वस्थ हो गया। यह प्रार्थना की शक्ति का विलक्षण उदाहरण है।

सच्चे भक्त की पहचान

सच्चे मन से ईश्वर की भक्ति करने वाला व्यक्ति कभी निराश, हताश या दुखी नहीं रहता। वह अपने व्यवहार से किसी व्यक्ति, समाज या राष्ट्र का अहित नहीं करता। केवल माला, यज्ञोपवीत, जटाजूट या पूजा-स्थलों में जाना ही भक्ति नहीं है। सच्चा भक्त वही है जो तपस्वी, निष्काम सेवक, निर्भीक और सदैव प्रसन्न रहता है।

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