कांग्रेस को झटका: नसीमुद्दीन सिद्दीकी बाहर, बसपा अतीत के बाद नए सियासी समीकरण?

लखनऊ. उत्तर प्रदेश की सियासत में आगामी विधानसभा चुनावों से पहले कांग्रेस को बड़ा झटका लगा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता और पूर्व मंत्री नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस से इस्तीफा दे दिया है। उनके साथ करीब 72 अन्य नेताओं ने भी पार्टी छोड़ी है, जिनमें लगभग दो दर्जन पूर्व विधायक शामिल बताए जा रहे हैं।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी इससे पहले बहुजन समाज पार्टी में अहम भूमिका में रहे हैं और उन्हें पूर्व मुख्यमंत्री मायावती का करीबी माना जाता है। 2018 में उन्होंने बसपा छोड़कर भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस जॉइन की थी, लेकिन अब कांग्रेस से भी अलग हो गए हैं।
क्यों छोड़ा ‘हाथ’ का साथ?
इस्तीफे के बाद जारी बयान में नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कहा कि वे कांग्रेस में अपने साथियों के साथ जातिवाद और संप्रदायवाद के खिलाफ हो रहे अन्याय की लड़ाई लड़ने के उद्देश्य से शामिल हुए थे, लेकिन पार्टी में रहते हुए यह लड़ाई प्रभावी ढंग से नहीं लड़ पा रहे थे।
उन्होंने स्पष्ट किया कि उन्हें कांग्रेस के किसी भी पदाधिकारी से व्यक्तिगत शिकायत नहीं है, बल्कि यह फैसला सैद्धांतिक आधार पर लिया गया है। सिद्दीकी ने कहा कि वे अपने साथ इस्तीफा देने वाले नेताओं से मशविरा कर रहे हैं और जहां सहमति बनेगी, वहीं से जनता की लड़ाई लड़ी जाएगी।
72 नेताओं का सामूहिक इस्तीफा
पूर्व मंत्री के साथ कांग्रेस छोड़ने वालों में कई पूर्व विधायक और संगठन के वरिष्ठ पदाधिकारी शामिल हैं। इसे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के लिए संगठनात्मक झटके के रूप में देखा जा रहा है।
नसीमुद्दीन सिद्दीकी का राजनीतिक सफर
नसीमुद्दीन सिद्दीकी मूल रूप से बांदा जिले के स्योंढ़ा गांव के निवासी हैं। उनका राजनीतिक सफर 1988 में बांदा नगर पालिका अध्यक्ष के चुनाव से शुरू हुआ। 1991 में उन्होंने बसपा के टिकट पर बांदा सदर सीट से विधानसभा चुनाव जीतकर इतिहास रचा और जिले के पहले मुस्लिम विधायक बने। इसके बाद वे मायावती के भरोसेमंद नेताओं में शुमार हो गए।
‘मिनी मुख्यमंत्री’ से कैबिनेट मंत्री तक
2007 में बसपा सरकार बनने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी को उनकी राजनीतिक पकड़ और प्रशासनिक क्षमता के चलते ‘मिनी मुख्यमंत्री’ भी कहा गया। उन्होंने विभिन्न कार्यकालों में कैबिनेट मंत्री के रूप में जिम्मेदारियां निभाईं—
- 1995 में मायावती की पहली सरकार में मंत्री
- 1997 में अल्पकालिक सरकार में मंत्री
- 2002–03 में एक वर्ष तक कैबिनेट मंत्री
- 2007 से 2012 तक पूर्णकालिक बसपा सरकार में मंत्री
- पश्चिमी उत्तर प्रदेश में उन्हें एक कद्दावर नेता माना जाता रहा है।
खेल और राजनीति का अनोखा संगम
राजनीति में आने से पहले नसीमुद्दीन सिद्दीकी राष्ट्रीय स्तर के वॉलीबॉल खिलाड़ी रह चुके हैं। उन्होंने रेलवे में कॉन्ट्रैक्टर के रूप में भी काम किया। खेल और व्यवसाय से मिले अनुभव ने उनके राजनीतिक नेतृत्व को मजबूती दी।
परिवार का सियासी रसूख
नसीमुद्दीन सिद्दीकी पिछले दो दशकों तक विधान परिषद (MLC) के सदस्य रहे हैं। उनकी पत्नी हुस्ना सिद्दीकी भी पांच वर्षों तक एमएलसी रहीं। उनके बेटे अफजल सिद्दीकी ने 2014 में फतेहपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा था। सिद्दीकी का कहना है कि अब उनकी प्राथमिकता चुनाव लड़ने से ज्यादा प्रत्याशियों को जिताने के लिए प्रचार करना है।
कांग्रेस में एंट्री और अब एग्जिट
फरवरी 2018 में कांग्रेस में शामिल होने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी को पश्चिमी यूपी का प्रांतीय अध्यक्ष बनाया गया था। हालांकि अब उनके इस्तीफे ने प्रदेश की राजनीति में नए सवाल और संभावनाएं खड़ी कर दी हैं।
आगे क्या? नए सियासी समीकरणों की अटकलें
कांग्रेस छोड़ने के बाद नसीमुद्दीन सिद्दीकी के अगले कदम को लेकर अटकलें तेज हैं। चर्चा है कि वे अपनी पुरानी पार्टी बसपा में वापसी कर सकते हैं या समाजवादी पार्टी का दामन थाम सकते हैं। हालांकि उन्होंने फिलहाल साफ किया है कि समर्थकों की सहमति के बाद ही अंतिम फैसला लिया जाएगा।




