नाबालिग बेटी का गलत इस्तेमाल… मां की फरियाद के बाद बक्सर न्यायालय का सख्त फैसला सुर्खियों में
किशोरी से सामूहिक दुष्कर्म के पाॅक्सो (POCSO) अधिनियम से जुड़े एक मामले में बक्सर की अदालत ने असाधारण फैसला सुनाते हुए सभी चार आरोपित—बैजनाथ चौधरी, अंतु चौधरी, जोधा चौधरी और कविन्द्र चौधरी—को दोषमुक्त कर दिया।
बक्सर. किशोरी से सामूहिक दुष्कर्म के पाॅक्सो (POCSO) अधिनियम से जुड़े एक मामले में बक्सर की अदालत ने असाधारण फैसला सुनाते हुए सभी चार आरोपित—बैजनाथ चौधरी, अंतु चौधरी, जोधा चौधरी और कविन्द्र चौधरी—को दोषमुक्त कर दिया। न्यायालय ने पाया कि मामला झूठा गढ़ा गया था और सूचक तथा किशोरी की मां ने उसे “औजार की तरह इस्तेमाल” किया। इसलिए दोनों के खिलाफ पाॅक्सो की धारा 22 के तहत कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया गया है।
बक्सर के एडीजे-6 सह पाॅक्सो कोर्ट के विशेष न्यायाधीश अमित कुमार शर्मा ने स्पीडी ट्रायल के तहत नौ महीने में सुनवाई पूरी कर फैसला सुनाया। पुलिस ने भी 13 अगस्त को अपनी रिपोर्ट में केस को झूठा बताया था। यह मामला सिकरौल थाना क्षेत्र से जुड़ा है, जिसकी प्राथमिकी 28 मार्च को महिला थाने में दर्ज कराई गई थी।
प्राथमिकी में देरी और बयान में विरोधाभास
प्राथमिकी में घटना की तारीख 15 मार्च बताई गई थी, लेकिन इसकी रिपोर्ट 13 दिन बाद दर्ज कराई गई, जिसे न्यायालय ने संदेह का आधार माना। सुनवाई के दौरान कई गड़बड़ियां सामने आईं—
- पुलिस को दिए आवेदन में दावा था कि चारों आरोपितों ने कट्टा और पिस्टल का भय दिखाकर दुष्कर्म किया।
- लेकिन अदालत में किशोरी ने कहा कि “सिर्फ एक व्यक्ति ने दवा खिलाकर दुष्कर्म किया”।
- उसने यह भी बताया कि घटना के बाद वह खुद घर लौटी और अगले दिन मां को बताया।
- न्यायालय ने पाया कि प्राथमिकी और किशोरी के बयान में गंभीर विरोधाभास मौजूद हैं।
मां पर शक, पुराना विवाद और पंचायत का खुलासा
जांच में सामने आया कि किशोरी की मां अवैध शराब बेचने के धंधे में शामिल रही है और इस मामले में जेल भी जा चुकी है। जिन लोगों ने उसकी दुकान से बरामद शराब की जब्ती सूची पर गवाह के रूप में हस्ताक्षर किए थे, उन्हीं को इस केस में आरोपित बनाया गया।
मां को शक था कि इन्हीं लोगों ने उसके खिलाफ पुलिस को सूचना दी, जिसके चलते दोनों पक्षों में विवाद हुआ। 19 मार्च को सरपंच और बीडीसी सदस्य के पति की मौजूदगी में हुई पंचायत में 100 रुपए के स्टांप पेपर पर दोनों पक्षों ने तय किया कि वे एक-दूसरे पर कोई केस नहीं करेंगे। इसके बावजूद मामला दर्ज कराया गया, जिससे न्यायालय ने इसे गंभीर रूप से संदिग्ध माना।
किशोरी के बदलते बयान ने कमजोर किया केस
पुलिस ने अदालत में किशोरी के दो लिखित आवेदन प्रस्तुत किए—
- 16 मार्च वाले आवेदन में सामूहिक दुष्कर्म का आरोप।
- 17 मार्च वाले आवेदन में कहा गया कि “अंटू ने मेरे साथ कुछ गलत नहीं किया, पिछला आवेदन दूसरों के उकसावे पर दिया गया था।”
- इस दूसरे आवेदन पर किशोरी की मां के भी हस्ताक्षर थे।
- फोरेंसिक टीम द्वारा घटना वाले दिन के कपड़ों के बारे में पूछने पर किशोरी कुछ नहीं बता सकी।
- कॉल डिटेल, गवाहों के बयान और चिकित्सकीय जांच से इंकार—all ने मामले को और कमजोर कर दिया।
अदालत का निष्कर्ष: झूठा केस, कानून के दुरुपयोग की कोशिश
अदालत ने स्पष्ट कहा कि किशोरी की मां और सूचक ने उसे फर्जी मामला गढ़ने के लिए इस्तेमाल किया, जो गंभीर अपराध है।
इसी आधार पर न्यायालय ने दोनों के खिलाफ धारा 22 (झूठी शिकायत या झूठा आरोप) के तहत कार्रवाई शुरू करने का आदेश दिया और चारों आरोपितों को बरी कर दिया।




