इतिहास, रोमांस और विरासत का संगम— मांडू, एमपी की धड़कन
माण्डू—मध्यप्रदेश की धड़कन। इतिहास, प्रेमकथाएं और मानसूनी सौंदर्य का संगम। जहाज महल, रानी रूपमती महल, होशंगशाह का मकबरा और जामी मस्जिद सहित जानिए कब और कैसे पहुंचें।
भोपाल. कहा जाता है—जिसने माण्डू नहीं देखा, उसने मध्यप्रदेश देखा ही नहीं। भारत का दिल देखने निकलें तो मालवा की इस ऐतिहासिक नगरी को यात्रा-सूची में शामिल करना जरूरी है। बादशाह अकबर हों या जहांगीर, सबको माण्डू भाया। अकबर के दरबारी इतिहासकार अबुल फ़ज़ल तक कह गए थे—माण्डू पारस पत्थर की देन है। वर्षा ऋतु में तो माण्डू मानो सोलह श्रृंगार कर लेता है; हरियाली, बादल और ठंडी हवाएं इसे और भी मोहक बना देती हैं।
प्रेम, प्रकृति और स्थापत्य का अद्भुत संगम
माण्डू का नैसर्गिक सौंदर्य हर दिल को आशिक बना देता है। रानी रूपमती के महल से दिखती घाटियां प्रेम का पाठ पढ़ाती हैं। जहाज महल के बीच खड़े होकर असीम सुकून मिलता है, तो हिंडोला महल की ढलानदार दीवारें मन को डुला देती हैं। होशंगशाह का मकबरा अपनी भव्यता से ताजमहल की याद दिलाता है।
परमारों से खिलजियों तक—इतिहास की परतें
माण्डू का प्राचीन नाम मण्डप दुर्ग या माण्डवगढ़ रहा। परमार राजाओं—हर्ष, मुंज और राजा भोज—से लेकर खिलजी और मुग़ल काल तक, यह नगरी सत्ता, संस्कृति और वैभव की साक्षी रही। 15वीं सदी में मालवा के सुल्तान होशंगशाह ने राजधानी धार से माण्डू लाई। बाद में गयासुद्दीन खिलजी के समय विलासिता और स्थापत्य ने नई ऊंचाइयां छुईं।
रूपमती–बाज बहादुर की अमर कथा
माण्डू की पहचान बाज बहादुर और रानी रूपमती की प्रेमकथा से भी जुड़ी है। कहा जाता है कि रूपमती मां नर्मदा के दर्शन के बिना अन्न ग्रहण नहीं करती थीं, इसलिए बाज बहादुर ने माण्डू के सर्वोच्च स्थल पर रूपमती महल का निर्माण कराया। आज भी मालवा के लोकगीतों में उनकी प्रेमगाथा गूंजती है।
भूमिगत संरचनाएं और बावड़ियां
माण्डू जितना ऊपर फैला है, उतना ही नीचे भी। चंपा बावड़ी जैसी भूमिगत संरचनाएं कभी सुरक्षा का अभेद्य साधन थीं। नाहर झरोखा, दिलावर खान की मस्जिद, उजली-अंधेरी बावड़ी, तवेली महल और गदाशाह का घर—हर कदम पर इतिहास बोलता है।
जामी मस्जिद और अशर्फी महल
सीरिया की दमिश्क मस्जिद से प्रेरित जामी मस्जिद अपने मेहराबों और गुम्बदों के लिए प्रसिद्ध है। सामने स्थित अशर्फी महल कभी मदरसे के रूप में प्रयुक्त हुआ और आज भी अपनी भव्यता से आकर्षित करता है।
नीलकंठ महादेव और अन्य दर्शनीय स्थल
नीलकंठ महादेव मंदिर, रेवा कुंड, बाज बहादुर महल, हाथी महल, दाई का महल और जाली महल—ये सभी माण्डू की शान हैं और यात्रा को पूर्ण बनाते हैं।
आल्हा-ऊदल की वीरगाथाएं
आल्हा-ऊदल के बिना माण्डू का वर्णन अधूरा है। आल्हाखंड में वर्णित 52 युद्धों में पहली लड़ाई माण्डवगढ़ से जोड़ी जाती है। इसलिए बुंदेलखंड के आल्हा-गायक आज भी यहां तीर्थभाव से आते हैं।
कब और कैसे पहुंचें माण्डू
- माण्डू इंदौर से लगभग 100 किमी दूर है। नजदीकी रेलवे स्टेशन महू, इंदौर और खंडवा हैं। धार (30 किमी) से हर आधे घंटे बस सेवा उपलब्ध है। इंदौर, उज्जैन, रतलाम और भोपाल से भी नियमित बसें चलती हैं।
- यात्रा का सर्वोत्तम समय: जुलाई से मार्च—खासकर बारिश के बाद।
- ठहराव: निजी व सरकारी होटल उपलब्ध हैं। मध्यप्रदेश पर्यटन के मालवा रिसॉर्ट और मालवा रिट्रीट में उत्तम व्यवस्था है।




