मकर संक्रांति पर खिचड़ी का खास महत्व: धर्म, ज्योतिष और परंपरा से जुड़ा रोचक कारण
मकर संक्रांति पर खिचड़ी क्यों बनाई और दान की जाती है? जानिए सूर्य के मकर राशि में प्रवेश से जुड़ा ज्योतिषीय महत्व, धार्मिक मान्यताएं और बाबा गोरखनाथ से जुड़ी कथा।

हर साल माघ माह में सूर्य देव के मकर राशि में प्रवेश करने पर मकर संक्रांति का पर्व मनाया जाता है। इस वर्ष 14 जनवरी को सूर्य देव मकर राशि में प्रवेश करेंगे, इसलिए इसी दिन मकर संक्रांति का त्योहार मनाया जाएगा। देशभर में यह पर्व अलग-अलग नामों और परंपराओं के साथ मनाया जाता है। इस दिन सूर्य देव की विशेष पूजा की जाती है और पवित्र नदियों में स्नान-दान का विशेष महत्व माना गया है।
मकर संक्रांति को “खिचड़ी पर्व” क्यों कहा जाता है
उत्तर भारत के कई राज्यों में मकर संक्रांति को खिचड़ी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन घरों में खिचड़ी बनाई जाती है, खाई जाती है और जरूरतमंदों को दान भी की जाती है।
यही वजह है कि मकर संक्रांति का नाम आते ही खिचड़ी की परंपरा याद आती है। यह परंपरा सिर्फ स्वाद या भोजन तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे गहरी धार्मिक आस्था, सामाजिक भावना और ज्योतिषीय मान्यता जुड़ी हुई है।
ज्योतिषीय और धार्मिक महत्व
ज्योतिष शास्त्र के अनुसार, मकर संक्रांति के दिन सूर्य देव अपने पुत्र शनि देव की मकर राशि में प्रवेश करते हैं। इसे एक शुभ और सकारात्मक परिवर्तन माना जाता है।
मान्यता है कि इस दिन किया गया दान विशेष पुण्य फल देता है। खिचड़ी में शामिल चावल, दाल और घी को सात्विक आहार माना जाता है, जो सूर्य देव को अर्पित करने के लिए उपयुक्त होता है।
इस दिन खिचड़ी का दान करने से
- ग्रह दोष शांत होते हैं
- जीवन में स्थिरता और सकारात्मकता आती है
- सूर्य की कृपा प्राप्त होती है
- इसी कारण स्नान के बाद खिचड़ी का दान कर उसे प्रसाद रूप में ग्रहण किया जाता है।
बाबा गोरखनाथ से जुड़ी धार्मिक मान्यता
धार्मिक कथाओं के अनुसार, मकर संक्रांति पर खिचड़ी खाने की परंपरा बाबा गोरखनाथ से जुड़ी मानी जाती है। कथाओं में बताया जाता है कि कठिन परिस्थितियों और आक्रमणों के समय योगी और साधु नियमित रूप से भोजन नहीं बना पाते थे। ऐसे में बाबा गोरखनाथ ने दाल, चावल और मौसमी सब्जियों को एक साथ पकाने की सलाह दी। यह भोजन कम समय में तैयार हो जाता था और लंबे समय तक ऊर्जा देता था। धीरे-धीरे यह पौष्टिक और सरल भोजन साधु-संतों से समाज तक पहुंचा और बाद में मकर संक्रांति के पर्व से जुड़ गया। तभी से इस दिन खिचड़ी बनाना और खाना शुभ और पुण्यदायी माना जाने लगा।
निष्कर्ष: मकर संक्रांति पर खिचड़ी केवल एक परंपरागत भोजन नहीं, बल्कि सूर्य उपासना, दान, सात्विक जीवन और सामाजिक समरसता का प्रतीक है। यही कारण है कि यह परंपरा आज भी पूरे श्रद्धा और विश्वास के साथ निभाई जाती है।




