भारत का रणनीतिक दांव: ₹26,000 करोड़ की योजना से बदलेगा पावर बैलेंस
भारत ₹26,000 करोड़ की लागत से 52 सैन्य निगरानी सैटेलाइट तैनात करेगा। स्पेस-बेस्ड सर्विलांस फेज-III के तहत 2029 तक 24x7, नाइट-विजन और ऑल-वेदर निगरानी।

बेंगलुरु. वैश्विक सुरक्षा परिस्थितियों के बीच भारत अपने रक्षा तंत्र को कटिंग-एज तकनीक से सशक्त करने की दिशा में बड़ा कदम उठा रहा है। एरियल थ्रेट से निपटने के साथ-साथ अब अंतरिक्ष मोर्चे पर भी निगरानी क्षमता को नई ऊंचाइयों तक ले जाने की तैयारी है। सरकार ने ₹26,000 करोड़ की लागत से 52 अत्याधुनिक सैन्य निगरानी उपग्रहों का विशाल बेड़ा तैनात करने की योजना को मंजूरी दी है। यह कार्यक्रम ‘स्पेस-बेस्ड सर्विलांस फेज-III’ के तहत 2029 तक पूरा किया जाएगा और इसे भारत का अब तक का सबसे बड़ा सैन्य अंतरिक्ष निवेश माना जा रहा है।
नाइट-विजन और ऑल-वेदर निगरानी की ताकत
इस सैटेलाइट समूह की प्रमुख विशेषता इसकी नाइट-विजन और ऑल-वेदर क्षमता है। उन्नत इंफ्रारेड सेंसर, इलेक्ट्रो-ऑप्टिकल कैमरे और सिंथेटिक एपर्चर रडार (SAR) से लैस यह बेड़ा रात, बादल और खराब मौसम में भी उच्च-गुणवत्ता की इमेजरी उपलब्ध कराएगा। मल्टी-सेंसर व्यवस्था के कारण री-विजिट टाइम घटेगा, जिससे संदिग्ध गतिविधियों पर त्वरित प्रतिक्रिया संभव होगी।
कब होगा पहला लॉन्च, कैसी होगी तैनाती
योजना के अनुसार पहला उपग्रह अप्रैल 2026 तक लॉन्च किया जाएगा और अगले तीन वर्षों में पूरी प्रणाली तैनात कर दी जाएगी। उपग्रह लो-अर्थ ऑर्बिट (LEO) से लेकर जियोस्टेशनरी ऑर्बिट (GEO) तक अलग-अलग कक्षाओं में काम करेंगे। LEO उपग्रह हाई-रेजोल्यूशन और बार-बार पास देंगे, जबकि GEO संवेदनशील क्षेत्रों पर सतत निगरानी सुनिश्चित करेंगे—जिससे ब्लाइंड-स्पॉट की संभावना न्यूनतम होगी।
इसरो और निजी क्षेत्र की बड़ी साझेदारी
इस महत्वाकांक्षी परियोजना में Indian Space Research Organisation 21 उपग्रह विकसित करेगा, जबकि शेष 31 उपग्रह निजी कंपनियां बनाएंगी। यह किसी भारतीय सैन्य अंतरिक्ष कार्यक्रम में निजी क्षेत्र की अब तक की सबसे बड़ी भागीदारी होगी, जो ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ लक्ष्यों को मजबूती देगी।
ऑपरेशन और कमांड: रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी के हाथ
पूरी तरह सक्रिय होने पर प्रणाली का संचालन और नियंत्रण Defence Space Agency के पास होगा। सभी उपग्रहों से आने वाले डेटा का एकीकरण थलसेना, वायुसेना और नौसेना के बीच समन्वय को बेहतर बनाएगा, जिससे निर्णय-प्रक्रिया अधिक सटीक और तेज होगी।
रणनीतिक बढ़त और डेटरेंस में इजाफा
विशेषज्ञों के अनुसार, उपग्रह-आधारित रियल-टाइम इंटेलिजेंस आधुनिक युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाती है। नई प्रणाली सीमावर्ती क्षेत्रों में माइक्रो-चेंज—जैसे नई संरचनाएं, सैनिकों की तैनाती, समुद्र में जहाजों व पनडुब्बियों की आवाजाही—की पहचान कर सकेगी। कम समय में मिलने वाले अपडेट्स से कमांडरों को स्पष्ट स्थिति-चित्र मिलेगा और भारत की प्रतिरोधक क्षमता (डेटरेंस) और मजबूत होगी।




