चित्तौड़गढ़ का ऐतिहासिक क्षण: 11 देशों का डिजिटल मायरा, गोकुल जैसी गोशाला बनेगी आकर्षण
चित्तौड़गढ़ के नपानिया गांव के प्रवासी युवाओं ने 11 देशों से सहयोग कर 20 लाख की लागत से नंदेश्वर गोशाला बनवाई। नानी बाई का मायरा आयोजन बनेगा ऐतिहासिक।

चित्तौड़गढ़. राजस्थान की मिट्टी की खुशबू और गोसेवा के संस्कार सात समंदर पार भी फीके नहीं पड़े। Napania village के युवाओं ने यह साबित कर दिया कि इंसान चाहे दुनिया के किसी भी कोने में रहे, अपनी जड़ों को नहीं भूलता।
दुबई, अमेरिका, लंदन और जापान सहित 11 देशों में सफल करियर बना चुके इन युवाओं ने अपनी जन्मभूमि के प्रति कर्तव्य निभाते हुए करीब 20 लाख रुपये की लागत से एक विशाल नंदेश्वर गोशाला का निर्माण करवाया है। इस सामूहिक संकल्प की सिद्धि का उत्सव रविवार से नानी बाई का मायरा आयोजन के साथ मनाया जाएगा।
टीस से जन्मा संकल्प: 11 हजार से शुरू हुआ कारवां
नपानिया गांव के कई युवा रोजगार के सिलसिले में केन्या, चीन और मुंबई जैसे शहरों में बसे हैं। जब भी ये प्रवासी युवक त्योहारों पर गांव लौटते, तो सड़कों पर बेसहारा और घायल गोवंश को देखकर मन व्यथित हो उठता।
यही पीड़ा पिछले वर्ष एक ठोस संकल्प में बदली। शुरुआत सिर्फ 11-11 हजार रुपये के अंशदान से हुई, जो देखते ही देखते एक बड़े कारवां में बदल गई। प्रवासी युवाओं के साथ-साथ स्थानीय भामाशाहों ने भी इस पुण्य कार्य में खुलकर सहयोग किया।
11 देशों से आएगा डिजिटल मायरा, 151 गांव होंगे साक्षी
- गोशाला का शुभारंभ किसी साधारण कार्यक्रम की तरह नहीं, बल्कि एक ऐतिहासिक उत्सव के रूप में होगा।
- 11 जनवरी से Rakesh Purohit के सानिध्य में नानी बाई का मायरा कथा प्रारंभ होगी। दुबई, अमेरिका, यूके, केन्या, जापान और मस्कट सहित 11 देशों से प्रवासी भारतीय डिजिटल मायरा लेकर इस आयोजन में शामिल होंगे।
- मकर संक्रांति के दिन आसपास के 151 गांवों के श्रद्धालु इस पुण्य आयोजन के साक्षी बनेंगे।
20 बीघा भूमि पर गोकुल जैसा आशियाना
- Sanwaliyaji road पर करीब 20 बीघा भूमि में इस गोशाला का निर्माण किया गया है।
- लगभग 15 लाख रुपये की लागत से विशाल शेड
- गोवंश के लिए हर मौसम में सुरक्षित व्यवस्था
- पशु खेळ (नांद), बिजली कनेक्शन और भूमि समतलीकरण में ग्रामीणों का श्रमदान
- इस सामूहिक प्रयास ने गोशाला को एक गोकुल का स्वरूप दे दिया है।
क्या कहते हैं गोसेवा के सहभागी
“सड़कों पर चोटिल गोवंश को देखकर मन दुखी होता था। हमने तय किया कि अपनी कमाई का एक हिस्सा माटी और गोमाता को समर्पित करेंगे। गांव की एकता से ही यह संभव हो पाया।” — उदयलाल मेनारिया, प्रेम मेनारिया, संजय जाट एवं नपानिया के युवा
वहीं पं. राकेश पुरोहित ने कहा, “700 वर्ष पहले नरसीजी के भरोसे पर द्वारिकाधीश आए थे। आज उसी अटूट विश्वास के साथ नपानिया के युवा गोमाता के लिए भरोसे की कथा कर रहे हैं। यह आधुनिक पीढ़ी के लिए एक प्रेरणादायक मिसाल है।”




