इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा बयान: कौन सा नारा बना विवाद की वजह, ‘जय श्रीराम’ का मतलब भी समझाया
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि ‘सर तन से जुदा’ नारा भारतीय कानून, संप्रभुता और अखंडता के खिलाफ है। कोर्ट ने इसे BNS की धारा 152 के तहत दंडनीय मानते हुए बरेली हिंसा मामले में आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी।
लखनऊ. इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा है कि नारा ‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ न केवल भारतीय कानून की सत्ता को खुली चुनौती देता है, बल्कि यह देश की संप्रभुता और अखंडता के भी खिलाफ है। कोर्ट ने माना कि ऐसे नारे लोगों को सशस्त्र विद्रोह और हिंसा के लिए उकसाते हैं, इसलिए इन्हें दंडनीय माना जाएगा।
संविधान और न्याय प्रणाली को चुनौती देने वाला कृत्य
न्यायमूर्ति अरुण कुमार सिंह देशवाल ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि ‘सर तन से जुदा’ जैसे नारे भारतीय न्याय प्रणाली को चुनौती देते हैं, जो संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों पर आधारित है।
अदालत ने कहा कि इस प्रकार का कृत्य भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 152 के अंतर्गत अपराध है, जो देश की संप्रभुता, एकता और अखंडता को खतरे में डालने वाले कृत्यों से संबंधित है।
‘सजा कानून तय करता है, न कि भीड़’
कोर्ट ने टिप्पणी की, “‘गुस्ताख-ए-नबी की एक सजा, सर तन से जुदा’ जैसा नारा लगाना न केवल भारत की संप्रभुता और अखंडता को चुनौती देता है, बल्कि भारतीय कानूनी व्यवस्था के भी खिलाफ है, जहां सजा का निर्धारण कानून और संविधान के अनुसार होता है, न कि किसी भीड़ द्वारा।”
धार्मिक नारों और हिंसा भड़काने में फर्क
अदालत ने कहा कि हर धर्म में श्रद्धा और आस्था व्यक्त करने के लिए नारे होते हैं—
- इस्लाम में ‘नारा-ए-तकबीर, अल्लाहु अकबर’
- सिख धर्म में ‘जो बोले सो निहाल, सत श्री अकाल’
- हिंदू धर्म में ‘जय श्रीराम’ और ‘हर-हर महादेव’
लेकिन यदि किसी नारे का इस्तेमाल डराने, धमकाने या हिंसा भड़काने के लिए किया जाता है, तो वह अपराध की श्रेणी में आता है।
कुरान या इस्लामी ग्रंथों में नहीं है ‘सर तन से जुदा’
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि ‘सर तन से जुदा’ नारे का कुरान या इस्लाम के किसी भी प्रामाणिक धार्मिक ग्रंथ में कोई उल्लेख नहीं है।
इसके बावजूद, कई लोग इसके अर्थ और प्रभाव को समझे बिना इसका उपयोग करते हैं, जो समाज और कानून-व्यवस्था के लिए गंभीर खतरा बनता है।
पाकिस्तान से फैला नारा, राज्य सत्ता को चुनौती का माध्यम
अदालत ने इस नारे की उत्पत्ति का उल्लेख करते हुए कहा कि यह पाकिस्तान से फैलकर भारत सहित अन्य देशों में पहुंचा।
कोर्ट के अनुसार, कुछ तत्वों द्वारा इसका इस्तेमाल अन्य धर्मों के लोगों को डराने और राज्य की सत्ता को चुनौती देने के लिए किया गया।
पैगंबर के आदर्शों के विपरीत है हिंसा
कोर्ट ने यह भी कहा कि पैगंबर मोहम्मद ने अपमान की स्थिति में भी करुणा और क्षमा का मार्ग अपनाया था और कभी हिंसा की वकालत नहीं की। अदालत ने टिप्पणी की कि पैगंबर के नाम पर हत्या या सिर कलम करने की बात करना, उनके आदर्शों का अपमान है।
बरेली हिंसा मामले में जमानत याचिका खारिज
यह टिप्पणी बरेली में सितंबर माह में हुई हिंसा से जुड़े एक मामले में जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई। आरोपी रिहान ने खुद को निर्दोष बताते हुए जमानत मांगी थी, लेकिन कोर्ट ने केस डायरी में मौजूद साक्ष्यों के आधार पर कहा कि आरोपी एक अवैध भीड़ का हिस्सा था, जिसने आपत्तिजनक नारे लगाए, पुलिसकर्मियों को घायल किया और सार्वजनिक व निजी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया।
कोर्ट ने स्पष्ट कहा, “इस मामले में जमानत देने का कोई आधार नहीं है।” इसके साथ ही अदालत ने जमानत याचिका खारिज कर दी।
कौन-कौन रहा पक्षकार
आरोपी की ओर से अधिवक्ता अखिलेश कुमार द्विवेदी ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने अदालत में पैरवी की।




