धर्म

विश्वास की शक्ति: जब मान लिया कि सब कुछ परमात्मा का है

महात्मा गांधी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत का अर्थ, वाल्मीकि रामायण की प्रेरक कथा और गीता के यज्ञ-चक्र के संदर्भ में जानिए क्यों संपत्ति का सदुपयोग और अपरिग्रह समाज की शांति और संतुलन के लिए अनिवार्य है।

महात्मा गांधी अपने समीप के धनिकों को बार-बार ‘ट्रस्टीशिप’ का उपदेश देते थे। उनका आशय था कि व्यक्ति स्वयं को संपत्ति का स्वामी न माने, बल्कि यह समझे कि ईश्वर ही वास्तविक स्वामी है और मनुष्य केवल उसका ट्रस्टी—संरक्षक और सेवक—है। यह विचार न केवल नैतिक ऊंचाई देता है, बल्कि समाज में संतुलन और करुणा भी स्थापित करता है।

स्वामित्व की भावना बनाम ट्रस्टीशिप

जब व्यक्ति स्वयं को संपत्ति का स्वामी मानता है, तो उसके उपयोग में किसी का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं करता और मनमाने ढंग से खर्च करता है। इसके विपरीत, ट्रस्टीशिप का भाव यह सिखाता है कि संपत्ति दूसरों की सेवा के लिए है। यह भावना व्यक्ति को संयम, करुणा और उत्तरदायित्व की ओर ले जाती है—जहां दुरुपयोग के स्थान पर सदुपयोग होता है।

सार्वजनिक संपत्ति का दुरुपयोग: नैतिक पतन

विशेषकर मठ-मंदिर और सार्वजनिक न्यासों की संपत्ति को निजी स्वार्थ में खर्च करना घोर निंदनीय माना गया है। ऐसी प्रवृत्ति न केवल सामाजिक विश्वास को तोड़ती है, बल्कि नैतिक पतन का कारण भी बनती है।

वाल्मीकि रामायण की प्रेरक कथा

इस संदर्भ में वाल्मीकि रामायण की एक उद्बोधक कथा उल्लेखनीय है। एक कुत्ता प्रभु राम के दरबार में न्याय मांगता है—एक ब्राह्मण द्वारा अकारण प्रहार के विरुद्ध। दोष स्वीकार होने पर दंड पर विचार होता है। कुत्ता आश्चर्यजनक रूप से ब्राह्मण को कलिंजर मठ का मठाधीश बनाने का सुझाव देता है।

कुत्ता बताता है कि वह अपने पिछले जन्म में स्वयं मठाधीश था, पर सार्वजनिक अर्पित धन के उपभोग के कारण उसे कुत्ते की योनि मिली। संदेश स्पष्ट है—जो देव, बालक, स्त्री और भिक्षुकों के लिए अर्पित धन का दुरुपयोग करता है, उसका पतन निश्चित है।

गीता का संदेश: यज्ञ-चक्र और संपत्ति

भगवद गीता के अनुसार संपत्ति प्रकृति के यज्ञ-चक्र से प्राप्त होती है; अतः उसका उपयोग उसी चक्र को सुचारु रखने के लिए होना चाहिए। जहां अभाव है, वहां संपन्नता का प्रवाह होना चाहिए। जो व्यक्ति केवल भोग के लिए संपत्ति का उपयोग करता है, उसे गीता में स्तेन्य—अर्थात चोर—कहा गया है।

अपरिग्रह: अतिरिक्त का समाज को समर्पण

आवश्यकता से अधिक होने पर उसका अभावग्रस्तों में वितरण अपरिग्रह कहलाता है। अपरिग्रह और ट्रस्टीशिप को जीवन में अंगीकार न करने से समाज में पीड़ा, विक्षोभ और आक्रोश बढ़ता है, जो अंततः अशांति और तनाव को जन्म देता है।

निष्कर्ष

ट्रस्टीशिप केवल आर्थिक सिद्धांत नहीं, बल्कि जीवन-दृष्टि है—जो व्यक्ति, समाज और प्रकृति के बीच संतुलन बनाती है। यही दृष्टि व्यक्ति को नैतिक ऊंचाई, समाज को करुणा और व्यवस्था को स्थायित्व प्रदान करती है।

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