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न्यायपालिका का संदेश साफ: “कामकाज ठप हो जाएगा”, CJI की टिप्पणी के बाद याचिका खारिज

नई दिल्ली. सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम मजदूरी को मौलिक अधिकार घोषित करने से इनकार कर दिया है। जस्टिस सूर्यकांत** की अध्यक्षता वाली पीठ ने गुरुवार को स्पष्ट किया कि घरेलू कामगारों के लिए न्यूनतम वेतन तय करना नीतिगत निर्णय है, जो राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र में आता है और इस पर न्यायपालिका का हस्तक्षेप सीमित है। यह टिप्पणी पेन थोजिलालारगल संगम और अन्य बनाम भारत संघ मामले की सुनवाई के दौरान की गई।

“हर घर मुकदमे में फंस जाएगा”: CJI की टिप्पणी

जस्टिस जॉयमाल्या बागची के साथ पीठ में शामिल मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने आशंका जताई कि यदि घरेलू कामगारों के लिए अनिवार्य न्यूनतम वेतन तय किया गया, तो इसके उलटे और व्यावहारिक रूप से गंभीर परिणाम हो सकते हैं।

CJI ने कहा— “न्यूनतम वेतन तय होते ही हर घर मुकदमेबाजी में फंस जाएगा। लोग घरेलू कामगार रखना ही बंद कर देंगे। ट्रेड यूनियनें हर घर को अदालत तक घसीटेंगी।”

उन्होंने उदाहरण देते हुए कहा कि कई उद्योगों में ट्रेड यूनियनों के हस्तक्षेप के बाद रोजगार के अवसर घटे हैं और घरेलू कामगारों के मामले में भी ऐसा हो सकता है।

मौलिक अधिकार की दलील पर कोर्ट की चिंता

पीठ ने माना कि यह तर्क आकर्षक है कि न्यूनतम वेतन न होने से घरेलू कामगारों के समानता, गैर-भेदभाव और निष्पक्ष रोजगार से जुड़े अधिकार (अनुच्छेद 14, 15 और 16) प्रभावित हो सकते हैं। हालांकि, कोर्ट ने चेताया कि अति-सक्रिय ट्रेड यूनियनें अंततः इन्हीं कामगारों को और अधिक असुरक्षित स्थिति में छोड़ सकती हैं। CJI ने कहा— “परिणामों पर विचार करें। ट्रेड यूनियनें अंत में इन्हें छोड़ देंगी और इनके पास कहीं जाने की जगह नहीं बचेगी।”

घरेलू कामगार एजेंसियों के शोषण पर सवाल

कानूनी पोर्टल Bar & Bench के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू कामगारों को उपलब्ध कराने वाली एजेंसियों की भूमिका पर भी गंभीर चिंता जताई। मुख्य न्यायाधीश ने बताया कि एक समय सुप्रीम कोर्ट परिसर में भी एजेंसियों के माध्यम से कामगार रखे गए थे।

उन्होंने कहा— “हम एजेंसियों को 40,000 रुपये प्रति कर्मचारी देते थे, लेकिन उन गरीब लड़कियों को केवल 19,000 रुपये मिलते थे। यहीं से भरोसा टूटता है।”

CJI ने यह भी कहा कि कई आपराधिक घटनाएं एजेंसियों के माध्यम से कामगार रखने के मामलों में सामने आती हैं, न कि सीधे मानवीय संपर्क से रोजगार देने में।

अदालत ने याचिका पर क्या कहा

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ताओं की मांग को स्वीकार करने के लिए कानून में संशोधन आवश्यक होगा और ऐसा निर्देश देना न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र से बाहर है।

अपने आदेश में कोर्ट ने कहा— “जब तक विधायिका को कानून बनाने के लिए नहीं कहा जाता, तब तक कोई प्रभावी आदेश पारित नहीं किया जा सकता। ऐसा निर्देश देना इस अदालत के लिए उचित नहीं है।”

हालांकि, अदालत ने यह भी कहा कि राज्य सरकारों को घरेलू कामगारों की स्थिति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए और शोषण रोकने के लिए उपयुक्त तंत्र विकसित करना चाहिए।

क्या थी याचिका की मांग

याचिका में मांग की गई थी कि—

  • घरेलू कामगारों को न्यूनतम मजदूरी का मौलिक अधिकार घोषित किया जाए
  • उन्हें न्यूनतम वेतन अधिनियम या वेज कोड, 2019 से बाहर रखने को असंवैधानिक ठहराया जाए
  • याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजू रामचंद्रन ने अंतरराष्ट्रीय उदाहरणों का हवाला देते हुए कहा कि सिंगापुर जैसे देशों में घरेलू कामगारों के लिए छुट्टी और अन्य अधिकार अनिवार्य हैं।

इस पर जस्टिस बागची ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि घरेलू कामगारों के लिए कोई कल्याणकारी कानून नहीं हैं। उन्होंने असंगठित श्रमिक सामाजिक सुरक्षा अधिनियम का उल्लेख करते हुए कहा कि आर्थिक नीतियों के मामलों में न्यायालय अत्यंत सतर्क रुख अपनाता है।

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