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मोहन भागवत बोले: धर्म के बिना न सृष्टि, न समाज का संतुलन

मुंबई में RSS प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि धर्म ही सृष्टि का संचालक है। ‘विहार सेवक ऊर्जा मिलन’ में उन्होंने सेवा, निष्ठा और युवाओं की भूमिका पर जोर देते हुए भारत के विश्व गुरु बनने का विश्वास जताया।

मुंबई. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख मोहन भागवत ने रविवार को कहा कि धर्म ही पूरी सृष्टि का संचालक है। सृष्टि के निर्माण के साथ उसे चलाने के लिए जो नियम बने, वही धर्म हैं और पूरी दुनिया उन्हीं नियमों पर चलती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि राज्य भले ही सेकुलर हो सकता है, लेकिन मनुष्य, प्रकृति या सृष्टि की कोई भी वस्तु धर्म के बिना नहीं रह सकती। भागवत यह बातें मुंबई में आयोजित ‘विहार सेवक ऊर्जा मिलन’ कार्यक्रम में कह रहे थे।

धर्म: सृष्टि के नियम और जीवन का आधार

संघ प्रमुख ने उदाहरण देते हुए कहा कि पानी का धर्म बहना है और आग का धर्म जलाना। इसी प्रकार प्रत्येक व्यक्ति का भी अपना धर्म और कर्तव्य होता है—जैसे पुत्र धर्म, राजधर्म और समाज धर्म। उन्होंने कहा कि ये नियम हमारे पूर्वजों ने गहन आध्यात्मिक चिंतन और कठिन साधना के माध्यम से समझे और बिना औपचारिक भाषणों के भी आम जीवन में धर्म को उतार दिया। यही कारण है कि भारतवर्ष की रग-रग में धर्म रचा-बसा है।

‘धर्म’ ही सृष्टि का ड्राइवर

भागवत ने प्रतीकात्मक भाषा में कहा कि उनके पास ड्राइवर नहीं है, लेकिन उन्हें, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और समाज के अनेक लोगों को चलाने वाली एक ही शक्ति है। यदि हम उस शक्ति द्वारा चलाई जा रही गाड़ी में बैठे हैं, तो कभी दुर्घटना नहीं होगी। उस ड्राइवर का नाम—धर्म। सृष्टि के चलने का नियम ही धर्म है और सब कुछ उसी पर आधारित है।

परिस्थितियां, निष्ठा और कर्म

उन्होंने कहा कि परिस्थितियां हमारे नियंत्रण में नहीं होतीं; वे उसकी इच्छा से आती-जाती हैं। यदि परिवर्तन होगा तो हम केवल निमित्त बनेंगे, और यदि नहीं भी हुआ, तो भी नुकसान नहीं—क्योंकि अच्छे कर्मों के साथ जिया गया जीवन हमें श्रेष्ठ स्थान तक ले जाता है। इसी निष्ठा के साथ अहंकार से मुक्त होकर सबको साथ लेकर सेवा करते रहना चाहिए।

धर्म-बल से विश्व गुरु की ओर

भागवत ने कहा कि देश में धर्म का बल खड़ा हो रहा है। जब यह पूरी तरह स्थापित होगा, तब भारत अपनी समस्याओं पर विजय पाकर पुनः विश्व गुरु बनेगा और परम वैभव व सामर्थ्य के साथ वैश्विक मंच पर अग्रणी स्थान प्राप्त करेगा। उन्होंने विश्वास जताया कि वह दिन हमारी आंखों के सामने आएगा—शर्त बस इतनी है कि धर्म पर अडिग रहकर सेवा जारी रखी जाए।

युवाओं की भूमिका

युवाओं की सराहना करते हुए संघ प्रमुख ने कहा कि उनमें अंतर्निहित शक्ति है। भक्तिभाव और सेवा-भाव संतों का स्वभाव है—वे दूसरों के छोटे गुण को भी बड़ा करके देखते हैं। मंच से कही गई बातों को वे उसी भावना के साथ स्वीकार कर रहे हैं।

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