
नई दिल्ली. आधी रात का वक्त था। वसीम चैन की नींद सो रहा था, लेकिन अगली सुबह जब सूरज की पहली किरणें बुराड़ी की गलियों में पहुंचीं, तो वह अपने बिस्तर से गायब था। यह सिर्फ एक परिवार की कहानी नहीं है। देश की राजधानी दिल्ली में महज 15 दिनों के भीतर 800 से अधिक बच्चों और किशोरों के लापता होने की खबरों ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। यह आंकड़े महज संख्या नहीं, बल्कि उन माता-पिता के दर्द की गवाही हैं, जिनकी आंखें अब भी अपने बच्चों के लौट आने की राह देख रही हैं।
बुराड़ी से सामने आई दो दर्दनाक कहानियां
दिल्ली के बुराड़ी इलाके में पहुंचने पर दो ऐसे परिवारों से मुलाकात हुई, जिनके बेटे दिसंबर महीने से लापता हैं। दोनों मामलों में परिजनों का आरोप है कि पुलिस की शुरुआती कार्रवाई बेहद धीमी रही, जिससे अहम सुराग हाथ से निकल गए।
केस स्टडी 1: वसीम रजा — संगीत का सपना और अधूरी तलाश
- बिहार के किशनगंज से आकर बुराड़ी के मौर्य एनक्लेव में रहने वाले तेमुल हक और रूबी का 19 वर्षीय बेटा वसीम रजा 28 दिसंबर की सुबह से लापता है।
- विवाद की जड़: वसीम को गायन का शौक था, जबकि परिवार चाहता था कि वह एसी रिपेयरिंग सीखे।
- घटनाक्रम: 27 दिसंबर की रात वह घर पर सोया था। सुबह करीब 9 बजे वह घर से गायब मिला और अपना हारमोनियम साथ ले गया।
- पुलिस पर आरोप: पिता का कहना है कि पुलिस ने न तो गली की और न ही आसपास की सीसीटीवी फुटेज खंगाली।
- मां का दर्द: “वोट के वक्त सब घर-घर आते हैं, लेकिन जब बच्चा गायब होता है, तब कोई सुनने वाला नहीं रहता।”
केस स्टडी 2: ऋतिक झा — सिस्टम की लेटलतीफी की भेंट
- बुराड़ी के संत नगर इलाके का 16 वर्षीय ऋतिक झा जेईई मेंस की तैयारी कर रहा था। 17 दिसंबर को मां की डांट के बाद वह घर से निकला और फिर वापस नहीं लौटा।
- आखिरी लोकेशन: ऋतिक की अंतिम लोकेशन नेताजी सुभाष पैलेस (NSP) मेट्रो स्टेशन पर मिली।
- फुटेज का संकट: पुलिस को मेट्रो प्रशासन को पत्र लिखने में 7 दिन लग गए, तब तक पुरानी फुटेज डिलीट हो चुकी थी।
- मां की आशंका: ऋतिक की मां बेबी झा को आशंका है कि उनके बेटे का अपहरण कर लिया गया है।
आंकड़ों का आईना: राजधानी में बढ़ता खतरा
| लापता बच्चा | उम्र | क्षेत्र | लापता होने की तिथि |
|---|---|---|---|
| वसीम रजा | 19 वर्ष | मौर्य एनक्लेव, बुराड़ी | 28 दिसंबर |
| ऋतिक झा | 16 वर्ष | संत नगर, बुराड़ी | 17 दिसंबर |
वसीम के पिता का सवाल है—अगर 15 दिनों में 800 लोग गायब हो सकते हैं, तो राजधानी की सुरक्षा का दावा कितना मजबूत है?
सिस्टम की सुस्ती और मिटते सुराग
दोनों ही मामलों में परिवारों का आरोप है कि शुरुआती स्तर पर पुलिस की ढिलाई ने जांच को कमजोर कर दिया। कहीं सीसीटीवी फुटेज नहीं खंगाली गई, तो कहीं कागजी प्रक्रिया में देरी के कारण मेट्रो फुटेज हमेशा के लिए मिट गई। दिल्ली जैसे शहर में, जहां हर चौराहे पर कैमरों की मौजूदगी का दावा किया जाता है, बच्चों का यूं गायब हो जाना और हफ्तों तक कोई सुराग न मिलना बेहद चिंताजनक है।
सवाल–जवाब
दिल्ली में हाल के दिनों में लापता लोगों के आंकड़े क्या बताते हैं?
News18 India की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में महज 15 दिनों के भीतर 800 से अधिक लोगों के लापता होने की जानकारी सामने आई है।
वसीम रजा के मामले में पुलिस पर क्या आरोप हैं?
परिवार का कहना है कि पुलिस ने आसपास के सीसीटीवी कैमरों की जांच तक नहीं की।
ऋतिक झा के मामले में अहम फुटेज क्यों नहीं मिली?
पुलिस की ओर से मेट्रो प्रशासन को पत्र लिखने में देरी हुई, जिसके कारण पुरानी फुटेज डिलीट हो गई।
परिजनों की सबसे बड़ी चिंता क्या है?
वसीम की मां को किसी अनहोनी का डर है, जबकि ऋतिक की मां को बेटे के अपहरण की आशंका सता रही है।
जनप्रतिनिधियों से क्या आश्वासन मिला?
परिजनों का कहना है कि बुराड़ी विधायक के जनता दरबार में उन्हें एसडीएम या पुलिस कमिश्नर से बात कराने का आश्वासन दिया गया है।
निष्कर्ष: लापता बच्चों के ये मामले केवल पुलिस रिकॉर्ड का हिस्सा नहीं, बल्कि राजधानी की सुरक्षा व्यवस्था पर सीधा सवाल हैं। जब तक शुरुआती जांच में तेजी, तकनीकी संसाधनों का समय पर उपयोग और जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक दिल्ली की गलियां कई परिवारों के लिए उम्मीद और डर का मिला-जुला रास्ता बनी रहेंगी।




